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आज जाने की जिद न करो’ पर थम गई शाम, ‘हज़ार ख्वाहिशें’ ने छेड़े दिल के तार; ग़ज़लों से सजा सेक्टर-10 का ऑडिटोरियम

चंडीगढ़, 25 सितंबर 2026 Fact Recorder

Punjab Desk:  सेक्टर-10 के म्यूजियम ऑडिटोरियम में गुरुवार को ग़ज़लों की सुरमयी महफिल सजी। जैसे ही ‘आज जाने की जिद न करो’ के सुर गूंजे, पूरा माहौल भावनाओं से भर गया। इसके बाद ‘हज़ार ख्वाहिशें ऐसी’ और ‘चुपके चुपके रात दिन’ जैसी मशहूर ग़ज़लों ने श्रोताओं को देर तक बांधे रखा। महफिल में कहीं मोहब्बत की मिठास सुनाई दी तो कहीं जुदाई की कसक और जिंदगी के फलसफे ने लोगों को भावुक कर दिया।

मौका था ‘शाम-ए-ग़ज़ल’ कार्यक्रम का। नॉर्थ जोन कल्चरल सेंटर, पटियाला और मिनिस्ट्री ऑफ कल्चर, भारत सरकार की ओर से चंडीगढ़ सिटीजन फाउंडेशन के तत्वावधान में आयोजित इस कार्यक्रम में मुंबई और जयपुर से पहुंचे कलाकारों ने ग़ज़ल, शायरी और संगीत का खूबसूरत संगम पेश किया।

वकार खान की टीम ने बांधा सुरों का समां

मुंबई से पहुंचे उस्ताद ताज़े खान के बेटे वकार खान और उनकी टीम ने लोकप्रिय ग़ज़लों की प्रस्तुतियों से माहौल को सुरमयी बना दिया। ‘दिल ही दुखाने के लिए’, ‘हज़ार ख्वाहिशें’, ‘जब तुम साजदा’, ‘चुपके चुपके रात दिन’, ‘आज जाने की जिद न करो’ और ‘बात निकलेगी तो दूर तक जाएगी’ जैसी ग़ज़लों ने दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं।

इन प्रस्तुतियों में मेहंदी हसन, गुलाम अली और जगजीत सिंह की मशहूर ग़ज़ल गायकी की झलक दिखाई दी। पुरानी ग़ज़लों के नॉस्टैल्जिक रंग ने श्रोताओं को पुराने दौर की यादों में डुबो दिया।

डॉ. सुनील राही ने दिखाई ग़ज़ल गायकी की बारीकियां

जयपुर के प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक और संगीतकार डॉ. सुनील राही ने भी अपनी प्रस्तुतियों से महफिल में अलग रंग भर दिया। वे ग़ज़लकार स्वर्गीय मदन जयपुरी के सुपुत्र हैं और उन्होंने अपने पिता से ग़ज़ल गायकी की बारीकियां सीखीं। इसके अलावा वे पद्मश्री हरिहरन के शागिर्द भी रहे हैं। डॉ. राही ‘खजाना ग़ज़ल टैलेंट हंट-2023’ के विजेता रह चुके हैं।

उन्होंने डॉ. ताहिर फ़राज़ की ‘काश ऐसा कोई मंज़र होता’ से अपनी प्रस्तुति की शुरुआत की। इसके बाद निदा फ़ाज़ली की मशहूर रचना ‘होश वालों को खबर क्या’ ने माहौल को और भावुक कर दिया।

निदा फ़ाज़ली की रचनाओं ने छुआ दिल

डॉ. सुनील राही ने निदा फ़ाज़ली की ‘हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी’ के जरिए जिंदगी और समाज की तस्वीर पेश की। वहीं ‘अपना कोई मिले तो गले से लगाइए’ ने महफिल में अपनापन घोल दिया। अंत में ‘नग़्में हैं, शिकवे हैं’ की प्रस्तुति के साथ उन्होंने सुरों की इस खूबसूरत शाम को यादगार बना दिया।

ग़ज़ल की इस महफिल की खासियत यह रही कि कलाकारों ने केवल गीत प्रस्तुत नहीं किए, बल्कि हर शेर के भाव और एहसास को भी श्रोताओं तक पहुंचाया। मुंबई और जयपुर के कलाकारों की प्रस्तुतियों ने सुर, शब्द और संगीत का ऐसा संगम पेश किया कि कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी इसकी गूंज श्रोताओं के बीच देर तक बनी रही।