Home Health बच्चों के कैंसर इलाज के लिए हर साल 32 हजार से ज्यादा...

बच्चों के कैंसर इलाज के लिए हर साल 32 हजार से ज्यादा परिवारों का पलायन, रहने की चुनौती बनी बड़ी परेशानी

September 17,2026 Fact Recorder

Health Desk: भारत में बच्चों के कैंसर का इलाज सिर्फ बीमारी से लड़ने तक सीमित नहीं है। आर्थिक रूप से कमजोर हजारों परिवारों के लिए बच्चे के इलाज के लिए बड़े शहर तक पहुंचना और लंबे समय तक वहां सुरक्षित जगह पर रहना भी बड़ी चुनौती बन जाता है। सेंट जूड्स इंडिया के मुताबिक, हर साल 32 हजार से ज्यादा सीमित साधनों वाले परिवार अपने बच्चों के कैंसर के इलाज के लिए बड़े शहरों का रुख करते हैं।

सितंबर को बच्चों में कैंसर के प्रति जागरूकता बढ़ाने के महीने के तौर पर देखा जाता है। इसी दौरान बीमारी के इलाज से जुड़ी उन गैर-मेडिकल चुनौतियों पर भी ध्यान दिया जा रहा है, जिनका सामना मरीजों और उनके परिवारों को करना पड़ता है।

पैसे खत्म होने के बाद बढ़ जाती है मुश्किल

इलाज के लिए गांवों और छोटे शहरों से महानगरों में पहुंचे परिवारों के सामने अस्पताल के आसपास रहने की समस्या सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक होती है। कुछ परिवार अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार सस्ते लॉज या किराए की जगह पर रहते हैं, लेकिन पैसे खत्म होने के बाद स्थिति बेहद कठिन हो सकती है।

आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को कई बार रेलवे स्टेशन, अस्पताल के आसपास या फुटपाथ जैसी जगहों पर रहने के लिए मजबूर होना पड़ता है। लंबे समय तक ऐसी परिस्थितियों में रहना बच्चों के इलाज के दौरान अतिरिक्त परेशानी पैदा कर सकता है।

कमजोर इम्यूनिटी के बीच संक्रमण का खतरा

कैंसर के इलाज के दौरान बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर हो सकती है। ऐसे में साफ-सफाई की कमी और असुरक्षित रहने की जगह संक्रमण का जोखिम बढ़ा सकती है। सेंट जूड्स इंडिया के अनुसार, ऐसे बच्चों को निमोनिया और टीबी जैसे संक्रमणों का भी सामना करना पड़ सकता है।

यानी अस्पताल में इलाज चलने के बावजूद रहने का असुरक्षित वातावरण बच्चे की रिकवरी के लिए चुनौती बन सकता है।

अस्पतालों के पास ‘घर जैसा’ माहौल देने की कोशिश

सेंट जूड्स इंडिया कैंसर का इलाज करा रहे बच्चों और उनके परिवारों के लिए प्रमुख कैंसर अस्पतालों के पास रहने की सुविधा उपलब्ध कराता है। संस्था के मुताबिक, यहां परिवारों को मुफ्त और साफ-सुथरी रहने की सुविधा, ट्रांसपोर्ट सहायता, पोषण संबंधी सलाह, काउंसलिंग और बच्चों के लिए शिक्षा कार्यक्रम जैसी सुविधाएं दी जाती हैं।

सेंटर्स में संक्रमण से बचाव के लिए भी विशेष इंतजाम किए जाते हैं, ताकि परिवार इलाज के दौरान रहने और दूसरी बुनियादी जरूरतों की चिंता कम करके बच्चे के इलाज पर ध्यान दे सकें।

इलाज बीच में छोड़ने की दर में कमी का दावा

सेंट जूड्स के अनुसार, टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल के अनुमानों में इन सुविधाओं के बाद बच्चों के कैंसर का इलाज बीच में छोड़ने की दर में कमी देखी गई। संस्था का दावा है कि यह दर पहले करीब 30 फीसदी थी, जो इन सुविधाओं के बाद 5 फीसदी से कम रह गई।

सेंट जूड्स के सेंटर चेन्नई, दिल्ली, गुवाहाटी, हैदराबाद, जयपुर, कोलकाता, मुंबई, नवी मुंबई, मुजफ्फरपुर, बेंगलुरु, वाराणसी, वेल्लोर और विशाखापत्तनम समेत कई शहरों में संचालित होने की जानकारी दी गई है। संस्था के मुताबिक, इन सेंटर्स के जरिए 876 से ज्यादा बच्चों की मदद की जा रही है।

कैंसर सर्वाइवर्स के लिए भी कार्यक्रम

सेंट जूड्स ने कैंसर से ठीक हो चुके बच्चों और युवाओं के लिए ‘सेंट जूड्स फॉर लाइफ’ कार्यक्रम भी शुरू किया है। संस्था के अनुसार, नवंबर 2020 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम से अब तक 2 हजार से ज्यादा कैंसर सर्वाइवर्स जुड़ चुके हैं।

बच्चों के कैंसर के इलाज में अस्पताल और दवाओं की अहम भूमिका है, लेकिन आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए अस्पताल तक पहुंचना और इलाज के दौरान सुरक्षित वातावरण में रहना भी उतना ही महत्वपूर्ण हो सकता है।