22 May 2026 Fact Recorder
National Desk: पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-अमेरिका के बीच जारी संघर्ष का असर अब भारत के दवा उद्योग पर भी दिखाई देने लगा है। दुनिया को सस्ती जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराने वाले भारत के फार्मा सेक्टर पर सप्लाई संकट का खतरा मंडरा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही बने रहे तो आम इस्तेमाल की दवाओं की कीमतों में तेजी आ सकती है और बाजार में कमी भी देखने को मिल सकती है।
दरअसल, खाड़ी क्षेत्र और होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के कारण समुद्री व्यापार प्रभावित हो रहा है। इससे दवा निर्माण में इस्तेमाल होने वाला जरूरी कच्चा माल यानी एपीआई (Active Pharmaceutical Ingredients) भारत तक पहुंचने में दिक्कत आ सकती है। माल ढुलाई की लागत बढ़ने और सप्लाई चेन प्रभावित होने से फार्मा कंपनियों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ेगा।
भारत का दवा उद्योग करीब 50 अरब डॉलर का माना जाता है और देश दुनिया के लगभग 200 देशों को जेनेरिक दवाएं निर्यात करता है। लेकिन इस उद्योग की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि दवा निर्माण के लिए जरूरी कच्चे माल का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर है। साल 2025 में भारत ने करीब 39,215 करोड़ रुपये के एपीआई आयात किए थे, जिनमें 70 से 75 प्रतिशत हिस्सा चीन से आया था।
उद्योग संगठनों और विशेषज्ञों के मुताबिक, अगर समुद्री मार्गों में रुकावट बढ़ती है तो सबसे पहले रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की सप्लाई प्रभावित हो सकती है। इनमें पैरासिटामोल, एंटीबायोटिक्स, ब्लड प्रेशर और डायबिटीज की दवाएं शामिल हैं। इसके अलावा कैंसर की दवाओं और इंजेक्शन जैसी संवेदनशील दवाओं के परिवहन पर भी असर पड़ सकता है क्योंकि इन्हें तय तापमान में सुरक्षित रखना जरूरी होता है।
फार्मा और लॉजिस्टिक्स सेक्टर से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि वैकल्पिक समुद्री रास्तों और अतिरिक्त सुरक्षा इंतजामों के कारण ट्रांसपोर्टेशन का खर्च बढ़ सकता है। इसका सीधा असर दवाओं की कीमतों पर पड़ेगा और आने वाले समय में मरीजों को ज्यादा कीमत चुकानी पड़ सकती है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस संकट का असर सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहेगा। अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के वे देश भी प्रभावित हो सकते हैं, जो सस्ती भारतीय दवाओं पर काफी हद तक निर्भर हैं।













