9 July 2026 Fact Recorder
National Desk: हर साल मानसून की पहली बारिश के साथ नई सड़कों, पुलों और एक्सप्रेसवे के क्षतिग्रस्त होने की खबरें सामने आती हैं। इससे हजारों करोड़ रुपये की बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की गुणवत्ता और निगरानी पर सवाल उठते हैं। हाल के दिनों में मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे के मिसिंग लिंक पर भूस्खलन और दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे के कुछ हिस्सों के धंसने जैसी घटनाओं ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार, वर्ष 2025-26 में देशभर की 51 राष्ट्रीय राजमार्ग और एक्सप्रेसवे परियोजनाओं में बारिश के कारण नुकसान दर्ज किया गया। इनमें सबसे अधिक मामले जम्मू-कश्मीर और हिमाचल प्रदेश से सामने आए।
विशेषज्ञों का कहना है कि केवल भारी बारिश को इन घटनाओं के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। टोल प्लानिंग विशेषज्ञों के अनुसार कई मामलों में निर्माण की गुणवत्ता में कमी, जल निकासी (ड्रेनेज) की खराब व्यवस्था, ढलानों की अपर्याप्त सुरक्षा, कमजोर डिजाइन और तय मानकों का सही तरीके से पालन न होना भी प्रमुख कारण होते हैं।
ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए विशेषज्ञ बेहतर निर्माण गुणवत्ता, प्रभावी ड्रेनेज सिस्टम, नियमित सुरक्षा ऑडिट, मौसम के पूर्वानुमान के आधार पर योजना और जोखिम वाले क्षेत्रों में वैज्ञानिक डिजाइन अपनाने की सलाह देते हैं।
सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) के मानकों के अनुसार किया जाता है। निगरानी के लिए स्वतंत्र इंजीनियर, ड्रोन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित मॉनिटरिंग, मोबाइल क्वालिटी कंट्रोल वैन और थर्ड-पार्टी ऑडिट जैसी आधुनिक व्यवस्थाएं लागू की गई हैं।
मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि जहां निर्माण संबंधी खामियां पाई जाती हैं, वहां संबंधित ठेकेदारों और एजेंसियों के खिलाफ शो-कॉज नोटिस, जुर्माना, डिबार करने जैसी कार्रवाई की जाती है। सरकार का मानना है कि बेहतर निगरानी, गुणवत्ता नियंत्रण और जवाबदेही से भविष्य में ऐसी घटनाओं को काफी हद तक रोका जा सकता है।













