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NSE IPO पर SEBI की सख्ती का असर? F&O से होने वाली 69% कमाई पर मंडराया खतरा

September 15,2026 Fact Recorder

Business Desk;  नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (NSE) जल्द ही अपना IPO लाने की तैयारी में है। एक्सचेंज का मजबूत बाजार दबदबा निवेशकों के लिए आकर्षण का बड़ा कारण है, लेकिन इसी मजबूत बिजनेस मॉडल से जुड़ा एक बड़ा जोखिम भी सामने आया है। NSE की कमाई का बड़ा हिस्सा फ्यूचर्स और ऑप्शंस (F&O) कारोबार से आता है और SEBI की लगातार सख्ती इस आय पर असर डाल सकती है।

NSE की कमाई का बड़ा हिस्सा F&O पर निर्भर

वित्त वर्ष 2026 में NSE की कुल आय का करीब 78.6 प्रतिशत हिस्सा ट्रांजेक्शन चार्ज से आया। इसमें अकेले ऑप्शंस ट्रेडिंग से करीब 9,997 करोड़ रुपये की कमाई हुई, जो कुल आय का लगभग 60 प्रतिशत है। वहीं फ्यूचर्स से करीब 1,480 करोड़ रुपये यानी 9 प्रतिशत आय हुई।

इस तरह ऑप्शंस और फ्यूचर्स को मिलाकर NSE की करीब 69 प्रतिशत कमाई F&O कारोबार से जुड़ी हुई है। यही वजह है कि डेरिवेटिव मार्केट में होने वाले किसी भी बड़े बदलाव का असर NSE की कमाई पर पड़ सकता है।

SEBI की सख्ती क्यों बढ़ी?

डेरिवेटिव कारोबार में छोटे निवेशकों को हो रहे भारी नुकसान के कारण SEBI ने नियमों को लगातार कड़ा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में इक्विटी डेरिवेटिव्स में कारोबार करने वाले करीब 87.7 प्रतिशत रिटेल ट्रेडर्स को नुकसान हुआ। इन निवेशकों का कुल नुकसान करीब 91,685 करोड़ रुपये बताया गया है।

नुकसान को कम करने के लिए SEBI ने अक्टूबर 2024 से कई कदम उठाए हैं। इनमें वीकली एक्सपायरी को सीमित करना, कॉन्ट्रैक्ट साइज बढ़ाना, ऑप्शन प्रीमियम का अग्रिम भुगतान और एक्सपायरी के दिन मार्जिन से जुड़े नियमों में बदलाव शामिल हैं।

NSE के लिए कितना बड़ा खतरा?

SEBI के नए नियमों से ऑप्शंस ट्रेडिंग की रफ्तार और बाजार के वॉल्यूम पर असर पड़ सकता है। इसका सीधा प्रभाव NSE के ट्रांजेक्शन रेवेन्यू पर पड़ने की आशंका है। हालांकि, अभी तक NSE के कारोबार में कोई बड़ा झटका देखने को नहीं मिला है।

जून तिमाही में एक्सचेंज का रेवेन्यू करीब 4,560 करोड़ रुपये रहा। हालांकि, ऑप्शंस प्रीमियम-टर्नओवर में NSE की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2024 के करीब 97 प्रतिशत से घटकर पहली तिमाही में 68.48 प्रतिशत रह गई।

क्या IPO निवेशकों को डरने की जरूरत है?

विशेषज्ञों का मानना है कि SEBI की सख्ती को NSE के IPO के लिए तत्काल बड़ा खतरा नहीं माना जाना चाहिए। नियमों के कारण कुछ समय के लिए ट्रेडिंग वॉल्यूम और खासकर सट्टेबाजी वाले कारोबार में कमी आ सकती है, लेकिन इससे जरूरी नहीं कि निवेशक बाजार से बाहर निकल जाएं।

अगर डेरिवेटिव कारोबार महंगा या मुश्किल होता है, तो निवेशक कैश इक्विटी जैसे दूसरे सेगमेंट की ओर रुख कर सकते हैं। ऐसे में बाजार के कुल कारोबार में बदलाव हो सकता है, लेकिन इसे NSE के बिजनेस मॉडल के लिए सीधे तौर पर बड़ा नुकसान नहीं माना जा सकता।

NSE ने बनाई कमाई बढ़ाने की रणनीति

NSE के MD और CEO आशीष चौहान के मुताबिक, एक्सचेंज की वीकली ऑप्शंस पर निर्भरता पहले की तुलना में कम हुई है। NSE लगातार दूसरे बिजनेस सेगमेंट को मजबूत करने पर काम कर रहा है, जिससे भविष्य में वीकली ऑप्शंस से आने वाले रेवेन्यू का हिस्सा और कम हो सकता है।

NSE की सबसे बड़ी ताकत उसका बाजार में दबदबा है। कैश इक्विटी से लेकर डेरिवेटिव मार्केट तक एक्सचेंज की मजबूत स्थिति बनी हुई है। ऐसे में SEBI के नए नियमों से कुछ चुनौतियां जरूर पैदा हो सकती हैं, लेकिन फिलहाल इन्हें NSE के IPO के लिए निर्णायक जोखिम मानना जल्दबाजी होगी।

निवेशकों के लिए अहम बात: NSE IPO में निवेश का फैसला केवल F&O से होने वाली कमाई को देखकर नहीं किया जाना चाहिए। कंपनी की वैल्यूएशन, भविष्य की कमाई, रेगुलेटरी बदलाव और अन्य बिजनेस सेगमेंट की ग्रोथ को भी ध्यान में रखना जरूरी होगा।