19 June 2026 Fact Recorder
National Desk: संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने वाले ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ के पारित होने के बावजूद देश की चुनावी राजनीति में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी है। चुनाव सुधारों पर काम करने वाली संस्था एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की एक नई रिपोर्ट में यह बात सामने आई है।
रिपोर्ट के अनुसार, 2023 में महिला आरक्षण कानून पारित होने के बाद हुए लोकसभा और विधानसभा चुनावों में राजनीतिक दलों ने महिलाओं को कुल उम्मीदवारों में औसतन केवल 10 प्रतिशत टिकट ही दिए।
51 हजार से अधिक उम्मीदवारों का विश्लेषण
‘चुनावों में महिला उम्मीदवार: महिला आरक्षण विधेयक 2023 के बाद पार्टी टिकट बंटवारे का विश्लेषण’ शीर्षक वाली रिपोर्ट में लोकसभा और विभिन्न राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों के विधानसभा चुनावों में मैदान में उतरे 51,708 उम्मीदवारों का अध्ययन किया गया।
इनमें केवल 5,095 उम्मीदवार महिलाएं थीं, जो कुल उम्मीदवारों का लगभग 10 प्रतिशत है। रिपोर्ट में सवाल उठाया गया है कि क्या महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए पर्याप्त राजनीतिक इच्छाशक्ति मौजूद है।
संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी कम
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में महिला मतदाताओं की संख्या 66 करोड़ से अधिक है और देश की कुल आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी लगभग 49 प्रतिशत है। इसके बावजूद वर्तमान संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व करीब 14 प्रतिशत ही है।
अंतर-संसदीय संघ (IPU) की एक मार्च 2025 की रैंकिंग के अनुसार, संसद में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के मामले में भारत 185 देशों में 151वें स्थान पर है।
लोकसभा चुनाव में 152 सीटों पर नहीं थी कोई महिला उम्मीदवार
2024 के लोकसभा चुनाव में कुल 8,360 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा, जिनमें केवल 800 महिलाएं थीं। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि 543 लोकसभा सीटों में से 152 संसदीय क्षेत्रों में एक भी महिला उम्मीदवार मैदान में नहीं उतरी।
राजनीतिक दलों के टिकट वितरण की बात करें तो:
- भाजपा ने 16 प्रतिशत महिलाओं को टिकट दिया।
- कांग्रेस और माकपा ने 13-13 प्रतिशत महिला उम्मीदवार उतारीं।
- बसपा ने 8 प्रतिशत टिकट महिलाओं को दिए।
- आम आदमी पार्टी ने अपने 22 उम्मीदवारों में किसी भी महिला को टिकट नहीं दिया।
विधानसभा चुनावों में भी स्थिति बेहतर नहीं
महिला आरक्षण कानून पारित होने के बाद 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विधानसभा चुनाव आयोजित हुए। इन चुनावों में कुल 31,429 उम्मीदवार मैदान में उतरे, जिनमें केवल 3,273 महिलाएं थीं।
यानी विधानसभा चुनावों में महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी मात्र 10.2 प्रतिशत रही। किसी भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश में महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत 14 फीसदी से अधिक नहीं पहुंच सका।
- ओडिशा (2024) में महिला उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 13.9 प्रतिशत रही।
- दिल्ली (2025) में यह आंकड़ा 13.7 प्रतिशत रहा।
- पुडुचेरी (2026) में 13.6 प्रतिशत महिला उम्मीदवार मैदान में उतरीं।
2029 तक लागू हो सकता है महिला आरक्षण
रिपोर्ट में कहा गया है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम का प्रभावी क्रियान्वयन परिसीमन प्रक्रिया के बाद ही संभव होगा। इसके लिए 2026-27 की जनगणना का समय पर पूरा होना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अनुमान है कि कानून का पूर्ण प्रभाव 2029 के आम चुनावों से देखने को मिल सकता है।
राजनीतिक दलों के सामने बड़ी चुनौती
रिपोर्ट से स्पष्ट है कि महिला आरक्षण कानून बनने के बावजूद राजनीतिक दलों ने टिकट वितरण में महिलाओं को पर्याप्त अवसर नहीं दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानूनी प्रावधान पर्याप्त नहीं होंगे, बल्कि राजनीतिक दलों को उम्मीदवार चयन प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे।













