10अप्रैल, 2026 फैक्ट रिकॉर्डर
Politics Desk: लखनऊ में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दलों के बीच नैरेटिव की जंग तेज होती नजर आ रही है, जिसमें शिक्षामित्रों का मानदेय बड़ा मुद्दा बन गया है। योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा शिक्षामित्रों के मानदेय में 8 हजार रुपये की एकमुश्त बढ़ोतरी कर इसे 18 हजार रुपये प्रतिमाह किए जाने को एक बड़ी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। इस फैसले के जरिए भाजपा शिक्षा क्षेत्र से जुड़े बड़े वर्ग को साधने के साथ-साथ विपक्ष, खासकर अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली सपा के मुद्दों को कमजोर करने की कोशिश में है।
वहीं सपा इस फैसले को ‘राहत बनाम हक’ के तौर पर पेश करते हुए अपना नैरेटिव बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है। पार्टी का कहना है कि शिक्षामित्रों को वास्तविक अधिकार और स्थायित्व मिलना चाहिए, न कि सिर्फ मानदेय बढ़ोतरी। शिक्षामित्रों का मुद्दा लंबे समय से राजनीति के केंद्र में रहा है—1999 में नियुक्ति से लेकर अलग-अलग सरकारों द्वारा मानदेय बढ़ाने और 2017 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद स्थिति में आए बदलाव तक यह विषय लगातार चर्चा में रहा है।
प्रदेश में वर्तमान में करीब 1.42 लाख शिक्षामित्र हैं, जो न केवल खुद वोटर हैं बल्कि अपने सामाजिक दायरे के जरिए कई सीटों पर चुनावी असर डाल सकते हैं। ऐसे में यह मुद्दा अब सिर्फ वेतन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सम्मान, स्थायित्व और भरोसे से जुड़ गया है। यही कारण है कि 2027 से पहले शिक्षामित्रों का रुख किस ओर जाता है, यह उत्तर प्रदेश की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकता है।













