September 01,2026 Fact Recorder
Chandigarh Desk: PGIMER के ENT विभाग ने चिकित्सा क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए महज सात महीने के शिशु में एक साथ दोनों कानों का कॉक्लियर इंप्लांटेशन सफलतापूर्वक किया। संस्थान के मुताबिक, यह भारत में सामने आए सबसे कम उम्र के सिमल्टेनियस बाइलेटरल कॉक्लियर इंप्लांट मामलों में से एक है।
चंडीगढ़: पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च (PGIMER) चंडीगढ़ के ईएनटी विभाग ने एक सात महीने के शिशु के दोनों कानों में एक साथ कॉक्लियर इंप्लांट कर महत्वपूर्ण चिकित्सा उपलब्धि हासिल की है। संस्थान के अनुसार, यह भारत में रिपोर्ट किए गए सबसे कम उम्र के मामलों में शामिल है, जिसमें दोनों कानों में एक ही समय पर कॉक्लियर इंप्लांट किया गया।
विशेषज्ञों की टीम ने की सफल सर्जरी
इस जटिल सर्जरी का नेतृत्व प्रो. रामदीप सिंह विर्क ने किया। ऑडियोलॉजी और रिहैबिलिटेशन टीम में प्रो. संजय मुंजाल, डॉ. पारुल सूद, डॉ. अनुराधा और मिस्टर ड्रेपथ शामिल रहे।
एनेस्थीसिया की जिम्मेदारी डॉ. नितिका बंसल ने संभाली। ईएनटी रेजिडेंट्स डॉ. अनुप्रिया, डॉ. भीष्म और डॉ. नारायण ने सर्जरी में सहयोग किया। ऑपरेशन थिएटर में तकनीकी सहायता साही राम और शिवनूर गिल ने प्रदान की।
कम उम्र में सुनने की समस्या की पहचान जरूरी
PGIMER के विशेषज्ञों ने बताया कि शिशुओं में सुनने की क्षमता से जुड़ी समस्या की समय पर पहचान और उपचार बेहद महत्वपूर्ण है। सुनने में कमी अक्सर बाहर से दिखाई नहीं देती, लेकिन यदि इसका इलाज समय पर न हो तो बच्चे के बोलने, भाषा सीखने, शिक्षा और मानसिक-सामाजिक विकास पर असर पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, शुरुआती स्तर पर सुनने की जांच, सही निदान और जरूरत पड़ने पर समय रहते कॉक्लियर इंप्लांटेशन से बच्चों को बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
इंप्लांट के बाद रिहैबिलिटेशन भी अहम
कॉक्लियर इंप्लांट के बाद नियमित ऑडिटरी रिहैबिलिटेशन को भी उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, लगातार फॉलोअप और रिहैबिलिटेशन से बच्चे को सुनने की क्षमता विकसित करने और आगे चलकर भाषा व संवाद कौशल बेहतर करने में मदद मिल सकती है।
PGIMER की इस उपलब्धि को कम उम्र के बच्चों में सुनने से जुड़ी समस्याओं के शुरुआती उपचार और आधुनिक चिकित्सा तकनीक के इस्तेमाल की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।













