September 28,2026 Fact Recorder
International Desk: आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल के साथ दुनिया भर में डेटा सेंटरों की जरूरत तेजी से बढ़ रही है। लेकिन इनके लिए भारी मात्रा में बिजली, पानी और जमीन की जरूरत होती है। इसी चुनौती के बीच गूगल अब डेटा सेंटर को धरती से अंतरिक्ष तक ले जाने की तैयारी कर रहा है। कंपनी का ‘प्रोजेक्ट सनकैचर’ लो अर्थ ऑर्बिट में सौर ऊर्जा से चलने वाले AI डेटा सेंटर की अवधारणा पर काम कर रहा है।
क्या है गूगल का प्रोजेक्ट सनकैचर?
प्रोजेक्ट सनकैचर गूगल की एक दीर्घकालिक रिसर्च पहल है। इसका उद्देश्य पृथ्वी की निचली कक्षा में ऐसे सैटेलाइट तैनात करना है, जिनमें AI कंप्यूटिंग के लिए जरूरी चिप्स मौजूद हों और जिन्हें सौर ऊर्जा से संचालित किया जा सके।
अंतरिक्ष में सूर्य का प्रकाश धरती की तुलना में अधिक लगातार उपलब्ध रहता है। ऐसे में गूगल का मानना है कि भविष्य में अंतरिक्ष आधारित डेटा सेंटर AI की बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने का एक विकल्प बन सकते हैं।
अंतरिक्ष में डेटा सेंटर लगाना क्यों है चुनौतीपूर्ण?
अंतरिक्ष में डेटा सेंटर स्थापित करना आसान नहीं है। सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक कूलिंग सिस्टम है। अंतरिक्ष के वैक्यूम में हवा नहीं होती, इसलिए धरती पर इस्तेमाल होने वाले सामान्य कूलिंग पंखे काम नहीं कर सकते। AI चिप्स काफी गर्मी पैदा करती हैं, जिसे विशेष तकनीक के जरिए बाहर निकालना होगा।
इसके अलावा अंतरिक्ष में डेटा सेंटर भेजने की लागत भी बेहद ज्यादा है। अनुमान के मुताबिक, 1 गीगावाट क्षमता वाले डेटा सेंटर को अंतरिक्ष में स्थापित करने की लागत करीब 51.5 अरब डॉलर तक हो सकती है, जबकि धरती पर इसकी लागत लगभग 16 अरब डॉलर बताई गई है।
हार्डवेयर खराब होने की स्थिति में उसकी मरम्मत भी बड़ी समस्या होगी। अंतरिक्ष में तकनीशियन भेजना बेहद मुश्किल है, इसलिए भविष्य में रोबोटिक सिस्टम के जरिए मरम्मत और असेंबली जैसी व्यवस्थाएं विकसित करनी पड़ सकती हैं।
अंतरिक्ष में बढ़ सकता है मलबे का खतरा
अगर बड़ी संख्या में AI सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजे जाते हैं, तो स्पेस डेब्रिस यानी अंतरिक्ष कचरे की समस्या बढ़ सकती है। उपग्रहों के आपस में टकराने से मौजूदा संचार, GPS और मौसम संबंधी प्रणालियों को भी खतरा पैदा हो सकता है।
इसके अलावा बड़ी संख्या में रॉकेट लॉन्च होने और पुराने उपग्रहों के वायुमंडल में प्रवेश करने से पर्यावरण पर असर पड़ने की आशंका भी जताई जाती है। अंतरिक्ष में बड़ी संख्या में चमकीले उपग्रह होने से खगोलीय अवलोकन और रात के प्राकृतिक आकाश पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
गूगल ने कैसे की तैयारी?
प्रोजेक्ट सनकैचर के तहत गूगल ने अपने हार्डवेयर को अंतरिक्ष के वातावरण के लिए तैयार करने के लिए कई परीक्षण किए हैं। फरवरी 2025 में कंपनी के इंजीनियरों ने AI चिप्स यानी TPU पर रेडिएशन टेस्ट किया। इसमें चिप्स को लंबे समय तक अंतरिक्ष में मिलने वाले रेडिएशन के बराबर प्रभाव में रखा गया।
कंपनी ने सैटेलाइट को रॉकेट लॉन्च के दौरान होने वाले कंपन और झटकों से जुड़े परीक्षणों से भी गुजारा। इसके अलावा वैक्यूम और तापमान की परिस्थितियों को दोहराने वाले थर्मल वैक्यूम चैंबर में विशेष कूलिंग सिस्टम का परीक्षण किया गया।
गूगल ने सैटेलाइट कंपनी प्लैनेट लैब्स के साथ साझेदारी कर एक छोटे सैटेलाइट फ्रेम में चार TPU चिप्स लगाने की तैयारी की है। यही तकनीक आगे चलकर बड़े अंतरिक्ष आधारित कंप्यूटिंग नेटवर्क की दिशा में शुरुआती कदम बन सकती है।
मिशन सफल हुआ तो क्या होंगे फायदे?
प्रोजेक्ट सनकैचर सफल होने पर AI कंप्यूटिंग के लिए लगातार उपलब्ध सौर ऊर्जा का इस्तेमाल किया जा सकेगा। अंतरिक्ष में उपग्रहों को धरती की तुलना में काफी अधिक सौर ऊर्जा उपलब्ध हो सकती है।
इससे भविष्य में धरती पर AI डेटा सेंटरों के कारण बिजली ग्रिड पर बढ़ रहे दबाव को कम करने में मदद मिल सकती है। साथ ही बड़े डेटा सेंटरों के लिए जमीन और भारी मात्रा में ताजे पानी की जरूरत भी घट सकती है।
अंतरिक्ष आधारित कंप्यूटिंग नेटवर्क विकसित होने पर कई सैटेलाइटों को आपस में जोड़कर बड़े स्तर पर AI प्रोसेसिंग की जा सकती है। हालांकि इसके लिए बेहद तेज लेजर कम्युनिकेशन, बेहतर कूलिंग, कम लॉन्च लागत और विश्वसनीय हार्डवेयर जैसी तकनीकी चुनौतियों का समाधान करना जरूरी होगा।
मस्क का अंतरिक्ष में डेटा सेंटर का सपना
अंतरिक्ष में कंप्यूटिंग क्षमता बढ़ाने का विचार केवल गूगल तक सीमित नहीं है। एलन मस्क भी भविष्य में अंतरिक्ष में बड़े पैमाने पर AI कंप्यूटिंग की संभावना की बात कर चुके हैं। ऐसे में गूगल का प्रोजेक्ट सनकैचर इस विचार को प्रयोगात्मक स्तर से आगे ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी पहल माना जा रहा है।
अगर शुरुआती परीक्षण सफल रहते हैं और लॉन्च की लागत में भविष्य में बड़ी कमी आती है, तो AI डेटा सेंटरों की अगली बड़ी दौड़ धरती के बजाय अंतरिक्ष में दिखाई दे सकती है।











