नई दिल्ली, 24 सितंबर 2026 Fact Recorder
National Desk: यमुना के प्रदूषित पानी से सिंचाई कर उगाई जा रही सब्जियों को लेकर एक अध्ययन में गंभीर चिंता सामने आई है। शोध के अनुसार, यमुना किनारे के कृषि क्षेत्रों की मिट्टी और वहां उगाई जाने वाली कई सब्जियों में भारी धातुओं की मात्रा निर्धारित सीमाओं से काफी अधिक पाई गई है। इससे इन सब्जियों के नियमित सेवन से स्वास्थ्य संबंधी जोखिम बढ़ने की आशंका जताई गई है।
बिना उपचार वाले पानी से मिट्टी में पहुंच रहीं भारी धातुएं
अध्ययन के मुताबिक, बिना उपचार किए गए अपशिष्ट जल से खेतों की सिंचाई किए जाने के कारण मोलिब्डेनम, एल्युमिनियम, जिंक, निकेल, क्रोमियम, कैडमियम और सीसा जैसी भारी धातुएं कृषि मिट्टी में जमा हो रही हैं। पौधों की जड़ें इन तत्वों को अवशोषित कर लेती हैं, जिससे सब्जियों में भी इनका जैव-संचयन देखा गया।
प्याज में निकेल 65 गुना और पालक में 97 गुना अधिक
शोधकर्ताओं ने कई सामान्य रूप से इस्तेमाल होने वाली सब्जियों की जांच की। अध्ययन में प्याज में निकेल की मात्रा निर्धारित सीमा से 65 गुना, जबकि पालक में 97 गुना अधिक पाई गई। सफेद मूली में क्रोमियम का स्तर 11 गुना, पालक में 12 गुना और सरसों में 22 गुना अधिक दर्ज किया गया।
अध्ययन में लाल मूली में मोलिब्डेनम 340.06 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम और क्रोमियम 36.58 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम तक पाया गया। मेथी में जिंक की मात्रा 177.72 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम रही। वहीं धनिया में निकेल 19.91 मिलीग्राम और कैडमियम 1.59 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम दर्ज किया गया। सरसों में सीसे की मात्रा 5.86 मिलीग्राम प्रति किलोग्राम तक पाई गई।
स्वास्थ्य जोखिम को लेकर भी जताई गई चिंता
अध्ययन में इन सब्जियों के सेवन से जुड़े संभावित स्वास्थ्य जोखिमों का भी आकलन किया गया। शोधकर्ताओं के अनुसार, कई मामलों में हजार्ड इंडेक्स सुरक्षित सीमा से काफी अधिक पाया गया। इसके अलावा, कुछ सब्जियों में कैंसर संबंधी जोखिम भी चिंता का विषय रहा।
अध्ययन में लाल मूली के लिए यह जोखिम 0.17, धनिया के लिए 0.16, जबकि पालक और सफेद मूली के लिए 0.14 दर्ज किया गया। शोधकर्ताओं ने इन जोखिमों में निकेल और क्रोमियम के योगदान को प्रमुख बताया है।
सरकारी निगरानी और प्रदूषण नियंत्रण पर जोर
इस शोध का नेतृत्व दिल्ली विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रो. दिनबंधु साहू ने किया। उन्होंने प्रदूषण प्रभावित कृषि क्षेत्रों में मिट्टी और फसलों की नियमित सरकारी निगरानी की जरूरत पर जोर दिया। साथ ही यमुना में प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों पर नियंत्रण करने और किसानों को ऐसी फसलों की ओर प्रोत्साहित करने की आवश्यकता बताई, जिनमें भारी धातुओं का संचय अपेक्षाकृत कम होता है।
अध्ययन के निष्कर्ष यमुना के प्रदूषण और उसके आसपास की कृषि गतिविधियों के बीच स्वास्थ्य संबंधी संभावित प्रभावों की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं।











