October 27,2026 Fact Recorder
Business Desk: : दुनिया भर में क्रिटिकल मिनरल्स यानी महत्वपूर्ण खनिजों की मांग तेजी से बढ़ रही है। इलेक्ट्रिक वाहनों, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्वच्छ ऊर्जा से जुड़े उद्योगों के लिए ये खनिज बेहद जरूरी हैं। वहीं, चीन से जुड़ी सप्लाई चेन पर निर्भरता कम करना भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। इस बीच देश के खनन क्षेत्र से सामने आए आंकड़े कई सवाल खड़े कर रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, देश में विभिन्न राज्यों ने अब तक 733 मिनरल ब्लॉक्स की नीलामी की है, लेकिन अगस्त 2026 तक इनमें से सिर्फ 125 में ही उत्पादन शुरू हो पाया था। बाकी 608 ब्लॉक्स अलग-अलग मंजूरियों और अन्य बाधाओं के कारण अटके हुए हैं। इससे साफ है कि खदानों की नीलामी के बाद वास्तविक उत्पादन शुरू करना अब भी बड़ी चुनौती है।
733 में से सिर्फ 125 खदानें क्यों हुईं चालू?
खनन परियोजनाओं में नीलामी से लेकर उत्पादन शुरू होने तक कई चरणों से गुजरना पड़ता है। इनमें जमीन अधिग्रहण, पर्यावरण मंजूरी, वन विभाग की अनुमति और अन्य प्रशासनिक स्वीकृतियां शामिल हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, बड़े और महत्वपूर्ण खनिज ब्लॉक्स में नीलामी के बाद उत्पादन शुरू होने में सात साल से अधिक समय लग रहा है। मंजूरियों की लंबी प्रक्रिया और नियमों की जटिलता के कारण परियोजनाओं में देरी हो रही है। इसका असर खनिजों की उपलब्धता, निवेश और औद्योगिक विकास पर पड़ सकता है।
चीन पर निर्भरता कम करना भारत के लिए चुनौती
क्रिटिकल मिनरल्स इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, सौर ऊर्जा और आधुनिक तकनीक से जुड़े उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन खनिजों की आपूर्ति और प्रोसेसिंग में चीन की मजबूत स्थिति भारत के लिए रणनीतिक चिंता का विषय है।
भारत में खनिज संसाधनों की उपलब्धता के बावजूद उन्हें निकालने और उच्च शुद्धता वाले खनिजों में बदलने की क्षमता विकसित करना जरूरी है। गहराई में मौजूद खनिजों की खोज के लिए आधुनिक ड्रिलिंग तकनीक और प्रोसेसिंग के लिए बेहतर औद्योगिक ढांचे की भी आवश्यकता है।
जमीन अधिग्रहण और वन मंजूरी सबसे बड़ी बाधाएं
खदानों को चालू करने में कई तरह की जमीनी समस्याएं सामने आती हैं।
- जमीन अधिग्रहण: अधूरे भूमि रिकॉर्ड, मालिकाना हक के विवाद और मुआवजे से जुड़े मुद्दों के कारण परियोजनाएं अटक जाती हैं।
- वन मंजूरी: वन भूमि से जुड़े प्रस्तावों और क्षतिपूरक वनीकरण के लिए जमीन की उपलब्धता में देरी हो सकती है।
- प्रशासनिक प्रक्रियाएं: अलग-अलग विभागों से मंजूरी लेने में लंबा समय लग सकता है।
- तकनीक की कमी: गहराई में मौजूद खनिजों की खोज और निष्कर्षण के लिए आधुनिक तकनीक व विशेषज्ञता जरूरी है।
- परिवहन की समस्या: सड़कों, रेलवे और बंदरगाहों से पर्याप्त कनेक्टिविटी नहीं होने पर खनिजों की ढुलाई प्रभावित हो सकती है।
इन बाधाओं के कारण नीलामी के बावजूद कई परियोजनाएं समय पर उत्पादन शुरू नहीं कर पातीं।
खनन क्षेत्र से राज्यों को भी बड़ी कमाई
रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, खनन क्षेत्र से सरकारी खजाने को सालाना 1.9 लाख करोड़ रुपये से अधिक का राजस्व मिलता है। इसमें से लगभग 90 फीसदी हिस्सा राज्यों को जाता है।
ऐसे में खदानों को समय पर चालू करना राज्यों की आय बढ़ाने, रोजगार के अवसर पैदा करने और उद्योगों को जरूरी कच्चा माल उपलब्ध कराने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। हालांकि, इसके लिए पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के अधिकारों का ध्यान रखना भी जरूरी है।
सरकार किन सुधारों पर दे रही है जोर?
खनन परियोजनाओं में तेजी लाने के लिए केंद्र सरकार राज्यों को मंजूरी प्रक्रिया बेहतर बनाने, आधुनिक तकनीक अपनाने और खनिजों की पूरी वैल्यू चेन विकसित करने की सलाह दे रही है।
इसमें खनिजों की खोज, निष्कर्षण, प्रोसेसिंग, परिवहन और औद्योगिक इस्तेमाल तक की व्यवस्था को मजबूत करना शामिल है। छोटे खनिजों के लिए बेहतर डेटा, स्पष्ट नियम और सिंगल-विंडो व्यवस्था भी प्रक्रिया को आसान बना सकती है।
निष्कर्ष
भारत के पास खनिज संसाधनों की क्षमता है, लेकिन केवल खदानों की नीलामी से आत्मनिर्भरता हासिल नहीं होगी। जमीन और वन मंजूरी में देरी कम करना, आधुनिक तकनीक विकसित करना और खनिजों की प्रोसेसिंग क्षमता बढ़ाना जरूरी है। यदि इन बाधाओं को दूर किया जाता है, तो भारत की आयात पर निर्भरता घटाने और घरेलू उद्योगों को मजबूत करने की दिशा में मदद मिल सकती है।











