21 July 2026 Fact Recorder
Business Desk: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का असर भारत की अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारत का कच्चे तेल का आयात बिल 61 प्रतिशत बढ़कर 49.8 अरब डॉलर पहुंच गया। यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब देश ने पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में कम मात्रा में कच्चे तेल का आयात किया।
पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से जून के दौरान भारत ने 59.8 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह आंकड़ा 62.6 मिलियन टन था। यानी आयात की मात्रा में करीब 4 प्रतिशत की कमी आई, लेकिन वैश्विक बाजार में ऊंची कीमतों के चलते कुल आयात बिल में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई।
जून महीने में भी भारत ने 18.9 मिलियन टन कच्चा तेल आयात किया, जो पिछले साल जून के मुकाबले लगभग 7 प्रतिशत कम था। इसके बावजूद जून का आयात बिल 48 प्रतिशत बढ़कर 14.7 अरब डॉलर हो गया।
क्यों बढ़ा आयात बिल?
विशेषज्ञों के अनुसार, आयात बिल बढ़ने की मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी रही। अप्रैल और मई के दौरान ब्रेंट क्रूड की कीमत कई बार 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य में अनिश्चितता के कारण वैश्विक तेल बाजार में कीमतों पर दबाव बना रहा।
हालांकि जून में ब्रेंट क्रूड की औसत कीमत घटकर 83.22 डॉलर प्रति बैरल रही, लेकिन पूरे तिमाही का असर भारत के आयात बिल पर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
भारत की अर्थव्यवस्था पर असर
भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में मामूली बढ़ोतरी भी देश के आयात बिल, चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) और महंगाई पर असर डाल सकती है।
विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि कच्चे तेल की कीमत में प्रति बैरल 1 डॉलर की वृद्धि होती है, तो भारत का वार्षिक आयात बिल लगभग 2 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। ऐसे में वैश्विक तेल बाजार की स्थिति आने वाले महीनों में भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अहम बनी रहेगी।













