15 अप्रैल, 2026 फैक्ट रिकॉर्डर
Rashifal Desk: हिंदू धर्म में सामान्यतः मृत्यु के बाद दाह संस्कार किया जाता है, लेकिन छोटे बच्चों के मामले में यह परंपरा अलग होती है। गरुड़ पुराण के अनुसार, जिन बच्चों के दूध के दांत नहीं निकले हों या जिनकी उम्र बहुत कम हो, उनका दाह संस्कार नहीं किया जाता, बल्कि उन्हें दफनाया जाता है। कई परंपराओं में 2 से 5 वर्ष तक के बच्चों के लिए भी यही नियम माना जाता है।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, छोटे बच्चों की आत्मा पूरी तरह निष्कपट और पवित्र मानी जाती है। माना जाता है कि उन्होंने अभी तक ऐसे कर्म नहीं किए होते, जिनके कारण उन्हें जन्म-मरण के बंधन में बंधना पड़े। इसलिए उनकी आत्मा को अग्नि द्वारा शुद्ध करने की आवश्यकता नहीं होती।
गरुड़ पुराण में यह भी बताया गया है कि मनुष्य के तीन शरीर होते हैं—स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर। बड़े लोगों में ये तीनों शरीर एक-दूसरे से गहराई से जुड़े होते हैं, इसलिए आत्मा को शरीर से अलग करने के लिए अग्नि संस्कार आवश्यक माना जाता है। लेकिन बच्चों में यह संबंध बहुत हल्का होता है, इसलिए उनकी आत्मा आसानी से शरीर छोड़ देती है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी इसके पीछे एक कारण बताया जाता है। छोटे बच्चों के सिर का ऊपरी भाग, जिसे ब्रह्मरंध्र कहा जाता है, पूरी तरह बंद नहीं होता। मान्यता है कि इसी कारण प्राण आसानी से शरीर से निकल जाते हैं और कपाल क्रिया जैसी प्रक्रिया की जरूरत नहीं पड़ती।
हिंदू मान्यताओं में शरीर को पांच तत्वों—मिट्टी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—से बना माना गया है। बड़े लोगों के शरीर को अग्नि के माध्यम से इन तत्वों में विलीन किया जाता है, जबकि बच्चे का शरीर प्रकृति के अधिक निकट माना जाता है। इसलिए उसे सीधे मिट्टी को सौंप देना अधिक स्वाभाविक और शांतिपूर्ण माना जाता है।













