इलाहाबाद हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘एक धर्म को ही सच्चा बताना दूसरों का अपमान’

27 मार्च 2026 फैक्ट रिकॉर्डर

National Desk:  इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि धर्मनिरपेक्ष भारत में किसी भी व्यक्ति द्वारा यह दावा करना कि कोई एक धर्म ही ‘एकमात्र सच्चा धर्म’ है, गलत है और इससे अन्य धर्मों का अपमान होता है।

न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की पीठ ने यह टिप्पणी एक याचिका को खारिज करते हुए की। यह याचिका रेवरेंड फादर विनीत विंसेंट परेरा द्वारा दायर की गई थी, जिन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 295A के तहत आरोप लगे हैं।

मामले में आरोप है कि याची ने प्रार्थना सभाओं के दौरान एक विशेष धर्म को ही ‘सच्चा धर्म’ बताया, जिससे अन्य धर्मों, विशेष रूप से हिंदू धर्म की भावनाएं आहत हुईं। हालांकि जांच में जबरन धर्मांतरण के कोई ठोस सबूत नहीं मिले, फिर भी अन्य धर्मों की आलोचना को लेकर पुलिस ने आरोपपत्र दाखिल किया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 295A IPC उन कृत्यों पर लागू होती है, जिनमें जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से किसी धर्म या धार्मिक भावनाओं का अपमान किया जाता है। कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह मामला इस धारा के दायरे में आता है, इसलिए इस स्तर पर इसे खारिज नहीं किया जा सकता।

राज्य पक्ष ने दलील दी कि इस मामले में तथ्यात्मक विवाद हैं, जिनका परीक्षण ट्रायल के दौरान ही संभव है। कोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताते हुए याचिका को खारिज कर दिया।

अदालत ने अपने फैसले में यह भी रेखांकित किया कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है, जहां सभी धर्मों और आस्थाओं का समान सम्मान जरूरी है, और किसी भी प्रकार की टिप्पणी जो अन्य धर्मों को नीचा दिखाए, स्वीकार्य नहीं है