12 फरवरी 2026 फैक्ट रिकॉर्डर
Chandigarh Desk: चंडीगढ़ जिला अदालत ने करीब पांच साल पुराने एनडीपीएस मामले में अहम फैसला सुनाते हुए आरोपी राजेश कुमार उर्फ काला उर्फ बाबा को बरी कर दिया। स्पेशल कोर्ट ने माना कि मामले में पुलिस अधिकारियों के बयानों में गंभीर विरोधाभास हैं और केस प्रॉपर्टी की सील व सुरक्षा को लेकर संदेह पैदा होता है, जिससे अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर हो गया।
यह मामला थाना सेक्टर-11 में 9 जनवरी 2020 को दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। पुलिस के अनुसार आरोपी को उसी दिन शाम करीब 7:15 बजे सेक्टर-25/38 के लाइट प्वाइंट के पास से 10.70 ग्राम हेरोइन और 2-2 एमएल के 14 बुप्रेनॉरफिन इंजेक्शन के साथ गिरफ्तार किया गया था। आरोपी के खिलाफ एनडीपीएस एक्ट की धारा 21 और 22 के तहत मामला दर्ज किया गया था।
केस प्रॉपर्टी की हैंडलिंग पर उठे सवाल
ट्रायल के दौरान बचाव पक्ष की जिरह में एक अहम गवाह और जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि केस प्रॉपर्टी को खोला गया था। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि इस तथ्य का उल्लेख न तो प्रारंभिक बयान में किया गया था और न ही चार्जशीट या धारा 161 सीआरपीसी के तहत दर्ज बयान में।
अदालत ने टिप्पणी की कि केस प्रॉपर्टी की सील और उसकी सुरक्षित कस्टडी को लेकर स्पष्ट और एकरूप बयान न होना जांच की निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है।
स्थानीय गवाहों को नहीं किया गया शामिल
बचाव पक्ष ने दलील दी कि आरोपी को घटना वाले दिन दोपहर करीब 2 बजे ही इलाके से उठा लिया गया था। इस संबंध में स्थानीय लोगों के बयान दर्ज किए गए थे, लेकिन उन्हें न तो चार्जशीट में शामिल किया गया और न ही अदालत की अनुमति से बाहर रखने का कोई ठोस कारण बताया गया।
रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि हाईकोर्ट के निर्देश के बाद दर्ज किए गए कुछ बयानों को अंतिम जांच रिपोर्ट का हिस्सा नहीं बनाया गया।
पुलिस गवाही में तालमेल की कमी
अदालत ने पाया कि पुलिस अधिकारियों के बयानों में कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सामंजस्य नहीं है। एक अधिकारी ने केस प्रॉपर्टी खोले जाने की बात स्वीकार की, जबकि अन्य रिकॉर्ड में इसका कहीं उल्लेख नहीं मिला। इससे अभियोजन की कहानी और अधिक संदिग्ध हो गई।
बचाव पक्ष के वकील तरमिंदर सिंह, मधु वाणी और मनजिंदर सिंह ने तर्क दिया कि आरोपी को झूठा फंसाया गया और जांच प्रक्रिया में गंभीर खामियां हैं।
अभियोजन पक्ष आरोप सिद्ध करने में विफल
स्पेशल कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है। गवाहों के विरोधाभासी बयान, केस प्रॉपर्टी की हैंडलिंग और जांच में पाई गई कमियों को देखते हुए आरोपी को बरी किया जाता है।











