27 जनवरी, 2026 फैक्ट रिकॉर्डर
International Desk: यूक्रेन संघर्ष: रूस अब सिर्फ अपने सैनिकों पर भरोसा नहीं कर रहा, बल्कि 126 देशों से लाए गए विदेशी युवाओं की मदद से युद्ध लड़ रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अफ्रीका, दक्षिण एशिया और लैटिन अमेरिका से आए युवाओं को नौकरी और बेहतर जिंदगी का लालच देकर रूस बुलाया गया, लेकिन वहां पहुंचते ही उन्हें युद्ध के मोर्चे पर भेज दिया गया।
कैसे फंसाए जा रहे युवा
हजारों युवा रूस में गार्ड, कुक, क्लीनर या टेक्नीशियन की नौकरी का वादा सुनकर गए।
कई ने मोटा पैसा और कर्ज लेकर एजेंटों को फीस दी।
रूस पहुंचते ही उन्हें ऐसे कागज़ों पर साइन करवा लिया गया, जिनकी भाषा वे समझ नहीं पाए।
कुछ ही दिनों में हथियार थमाकर सीधे यूक्रेन के मोर्चे पर भेज दिया गया।
फ्रंटलाइन की खतरनाक हकीकत
रिपोर्ट्स बताती हैं कि नए रंगरूटों की औसत ज़िंदगी केवल 72 घंटे है।
अनुभवी सैनिक पीछे रहते हैं, जबकि नए लड़ाके बिना पर्याप्त ट्रेनिंग के ड्रोन हमले, बमबारी और बारूदी सुरंगों के बीच भेजे जाते हैं।
विरोध करने वालों को धमकी, मारपीट, जेल या मौत की चेतावनी दी जाती है।
बेरोज़गारी और हताशा: दलालों का हथियार
अफ्रीकी देशों जैसे कैमरून में युवा आबादी बहुत अधिक है और बेरोज़गारी 35% तक है।
हताश युवा विदेश जाने के सपने के चक्कर में एजेंटों और फिक्सरों का शिकार बनते हैं।
सोशल मीडिया पर जॉब विज्ञापन के जरिए युवाओं को फंसाया जाता है।
बांग्लादेश का मामला
मकसुदुर रहमान नामक बांग्लादेशी युवक को क्लीनर की नौकरी का वादा किया गया।
एजेंट को करीब 10 हजार डॉलर फीस दी गई।
मॉस्को पहुंचते ही उन्हें समझ में आया कि यह असली नौकरी नहीं, बल्कि सैन्य अनुबंध था।
कुछ ही दिनों में उन्हें हथियार थमाकर बेसिक कॉम्बैट ट्रेनिंग शुरू कर दी गई।
दलालों का इंटरनेशनल नेटवर्क
फर्जी ट्रैवल कंपनियां, एजेंट और सोशल मीडिया विज्ञापन युवाओं को फंसाने का मुख्य साधन हैं।
गरीबी, बेरोज़गारी और विदेश जाने की मजबूरी का फायदा उठाकर युद्ध के लिए मानव संसाधन जुटाया जा रहा है।
बांग्लादेश पुलिस के अनुसार अब तक कम से कम 40 लोग मारे जा चुके हैं, जबकि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है।











