शहीदी दिवस: कश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिए औरंगज़ेब के सामने डटकर खड़े हुए गुरु तेग बहादुर – अद्वितीय बलिदान की कहानी

शहीदी दिवस: कश्मीरी पंडितों की रक्षा के लिए औरंगज़ेब के सामने डटकर खड़े हुए गुरु तेग बहादुर – अद्वितीय बलिदान की कहानी

25 नवंबर, 2025 फैक्ट रिकॉर्डर

National Desk:  सिख धर्म के नौवें गुरु, गुरु तेग बहादुर जी का 350वां शहीदी दिवस उनके अदम्य साहस, अटूट विश्वास और मानवता की रक्षा के लिए दिए गए सर्वोच्च बलिदान को समर्पित है। 1621 में अमृतसर में जन्मे गुरु तेग बहादुर जी, छठे पातशाह गुरु हरगोबिंद सिंह जी के सबसे छोटे पुत्र थे। अपने तपस्वी और शांत स्वभाव के कारण उन्हें प्रारंभ में ‘त्याग मल’ कहा जाता था। उन्होंने सिख धर्म को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई—700 से अधिक शब्द गुरु ग्रंथ साहिब में जोड़ने और आनंदपुर साहिब की स्थापना करने जैसी सेवाएं कीं, जिसके कारण उन्हें ‘तेग बहादुर’ की उपाधि मिली।

1675 में मुगल बादशाह औरंगज़ेब के अत्याचार चरम पर थे। कश्मीर के गवर्नर इफ्तेखार खान ने कश्मीरी पंडितों को इस्लाम स्वीकार करने या फिर मृत्यु को तैयार रहने का आदेश दिया। भयभीत पंडित गुरु तेग बहादुर के पास आनंदपुर साहिब पहुंचे और अपनी रक्षा की गुहार लगाई। गुरु जी ने निर्भय होकर कहा कि अगर धर्म बचाने के लिए किसी महान बलिदान की आवश्यकता है, तो वे अपना सिर देने को तैयार हैं। इससे क्रोधित औरंगज़ेब ने उन्हें इस्लाम स्वीकार कराने या मृत्यु देने का आदेश दिया।

रूपनगर के पास गुरु जी को साथियों के साथ गिरफ्तार किया गया और दिल्ली के चांदनी चौक लाया गया, जहां उन्हें यातनाएं दी गईं। उनके तीनों साथियों—भाई मती दास, भाई सती दास और भाई दयाल दास—को गुरु जी के सामने ही अत्यंत क्रूर तरीकों से मार दिया गया, पर गुरु तेग बहादुर जी अडिग रहे और किसी भी कीमत पर धर्म परिवर्तन के आगे नहीं झुके।

24 नवंबर 1675 को चांदनी चौक में गुरु तेग बहादुर जी का सार्वजनिक रूप से बलिदान कर दिया गया। यह घटना पूरे देश को झकझोर देने वाली थी—क्योंकि यह बलिदान कश्मीरी पंडितों और समूचे भारत की धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए था। आज जहां उनकी शहादत हुई, वहीं शीशगंज गुरुद्वारा स्थित है। गुरु तेग बहादुर जी को ‘हिंद की चादर’ कहा जाता है, क्योंकि उन्होंने देश की आस्था और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए प्राण न्यौछावर कर दिए। उनके पुत्र गुरु गोबिंद सिंह जी ने आगे सिख पंथ को नई दिशा दी और खालसा पंथ की स्थापना की। गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान न केवल सिखों का, बल्कि संपूर्ण भारत का गर्व है—धर्म, मानवता और न्याय के लिए सर्वोच्च त्याग का प्रेरक प्रतीक।