हिरोशिमा डे: परमाणु हमले के बाद किन बीमारियों का बढ़ जाता है खतरा?

हिरोशिमा डे: परमाणु हमले के बाद किन बीमारियों का बढ़ जाता है खतरा?

06 अगस्त 2025 फैक्ट रिकॉर्डर

Health Desk: हिरोशिमा डे: परमाणु हमले के विनाश और बीमारियों की कहानी, जो आज भी डराती है              6 अगस्त 1945 को अमेरिकी वायुसेना ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए थे। इस भयावह हमले में लाखों लोगों की जान चली गई और उससे भी अधिक लोग गंभीर रूप से प्रभावित हुए। आज भी कई पीढ़ियां उस हादसे के स्वास्थ्यगत प्रभावों से जूझ रही हैं। हिरोशिमा पर गिराए गए “लिटिल बॉय” नामक बम ने सिर्फ शहर को तबाह नहीं किया, बल्कि विकिरण (रेडिएशन) के ज़रिए मानव शरीर में ऐसी बीमारियों का बीज बोया, जिनका असर धीरे-धीरे सामने आता रहा।

विशेषज्ञों के मुताबिक, परमाणु हमले के बाद सबसे बड़ा खतरा विकिरण से होता है, जो सीधे तौर पर डीएनए को नुकसान पहुंचाता है। इससे कोशिकाएं टूटने लगती हैं और व्यक्ति कैंसर, ल्यूकेमिया और इम्यून सिस्टम फेलियर जैसी गंभीर बीमारियों से ग्रस्त हो सकता है। बम गिरने के कुछ ही महीनों में हजारों लोग रेडिएशन के प्रभाव से मारे गए, जबकि पांच से दस वर्षों के भीतर कैंसर के मामले तेजी से बढ़े।

शारीरिक बीमारियों के साथ-साथ मानसिक समस्याएं भी सामने आईं। रेडिएशन से प्रभावित लोग डर, तनाव, थकान, भूलने की बीमारी और न्यूरोलॉजिकल असंतुलन से परेशान रहने लगे। सबसे चिंताजनक पहलू यह था कि रेडिएशन का असर आने वाली पीढ़ियों पर भी पड़ा। प्रेग्नेंट महिलाओं के बच्चों में जन्मजात विकार, ब्रेन डैमेज, मांसपेशियों की कमजोरी और विकलांगता जैसे लक्षण पाए गए।

परमाणु हमले के वर्षों बाद तक मिट्टी, पानी और हवा में रेडियोएक्टिव तत्व मौजूद रहे, जिससे आज भी प्रभावित इलाकों में रहने वाले लोग बीमारियों के खतरे में हैं। रेडिएशन से प्रभावित क्षेत्रों में कई गांव आज भी खाली पड़े हैं।

रेडिएशन से बचाव के लिए त्वरित मेडिकल जांच, विशेष दवाएं और आयोडीन टैबलेट्स जैसी चिकित्सकीय सहायता दी जाती है, लेकिन इसके लक्षण जैसे त्वचा पर जलन, थकान, उल्टी, बाल झड़ना आदि दिखते ही तुरंत इलाज जरूरी होता है।

हिरोशिमा डे सिर्फ इतिहास की एक त्रासदी नहीं, बल्कि मानवता के लिए चेतावनी है—कि युद्ध, लालच और विनाशकारी तकनीक का अंधाधुंध इस्तेमाल हमें किस ओर ले जा सकता है। यह दिन याद दिलाता है कि विज्ञान का इस्तेमाल अगर विवेक से न किया जाए, तो उसका परिणाम पीढ़ियों तक भुगतना पड़ सकता है।