चेतावनी: वायु प्रदूषण से मस्तिष्क पर बुरा असर, मिर्गी का खतरा बढ़ा; दिल्ली-NCR सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र

19 मई, 2025 Fact Recorder

वायु प्रदूषण से मस्तिष्क पर असर: मिर्गी के खतरे में इजाफा, दिल्ली-NCR सबसे ज्यादा प्रभावित                  अब तक वायु प्रदूषण को सांस और फेफड़ों की बीमारियों का कारण माना जाता रहा है, लेकिन एक नए अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि यह मस्तिष्क को भी नुकसान पहुंचा सकता है। कनाडा के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध में सामने आया है कि लंबे समय तक वायु प्रदूषकों, विशेष रूप से पीएम2.5 और ओजोन गैस के संपर्क में रहने से मिर्गी (एपिलेप्सी) जैसी न्यूरोलॉजिकल बीमारी का खतरा बढ़ सकता है।

शोध में क्या सामने आया? कनाडा के लंदन हेल्थ साइंसेज सेंटर और वेस्टर्न यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने 18 वर्ष से अधिक उम्र के लाखों लोगों के स्वास्थ्य रिकॉर्ड और उनके पर्यावरणीय जोखिमों का विश्लेषण किया। छह वर्षों की अवधि में 24,761 नए मिर्गी के मामले दर्ज किए गए।

इस अध्ययन में खासतौर पर दो प्रदूषकों को मिर्गी के बढ़ते मामलों से जोड़ा गया:

  • PM2.5 के लंबे संपर्क से मिर्गी का खतरा 5.5% तक बढ़ जाता है।

  • ओजोन गैस के लंबे असर से यह खतरा 9.6% तक बढ़ सकता है।

यह पहली बार है जब वायु प्रदूषण को मिर्गी जैसी बीमारी से सीधे तौर पर जोड़ा गया है।

भारत में स्थिति और भी गंभीर रिपोर्ट बताती है कि भारत के कई शहरी इलाके जैसे दिल्ली, फरीदाबाद, नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम, मेरठ, मुजफ्फरनगर और पंजाब-राजस्थान के कुछ क्षेत्र वायु प्रदूषण के लिहाज से बेहद संवेदनशील हैं। इन जगहों पर हवा में मौजूद सूक्ष्म कण और हानिकारक गैसें न सिर्फ सांस और हृदय रोग बढ़ा रही हैं, बल्कि अब मस्तिष्क संबंधी समस्याओं का खतरा भी बढ़ा रही हैं।

डब्ल्यूएचओ की चेतावनी विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, दुनिया की लगभग 99% आबादी ऐसी हवा में सांस ले रही है जो सुरक्षित सीमा से अधिक प्रदूषित है। हर साल लगभग 70 लाख लोगों की मौत वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के कारण होती है।

मिर्गी के बढ़ते मामले लैंसेट पब्लिक हेल्थ की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में 5.2 करोड़ लोग मिर्गी से पीड़ित हैं। यह न्यूरोलॉजिकल बीमारियों में चौथे स्थान पर आती है। वर्ष 1990 से 2021 के बीच मिर्गी के मामलों में 10.8% की वृद्धि देखी गई है।

निष्कर्ष यह अध्ययन वायु प्रदूषण को केवल श्वसन या हृदय रोगों तक सीमित न मानने की चेतावनी देता है। अब यह मस्तिष्क को भी प्रभावित कर गंभीर बीमारियों की वजह बन सकता है। खासकर भारत जैसे प्रदूषण-ग्रस्त देशों में यह एक नया स्वास्थ्य संकट बनता जा रहा है, जिस पर तुरंत ध्यान देना जरूरी है।