ईरान युद्ध के बीच चाबहार पोर्ट पर अनिश्चितता, भारत के लिए क्यों है इतना अहम?

09 मार्च 2026 फैक्ट रिकॉर्डर

National Desk: पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव और ईरान से जुड़े युद्ध के बीच भारत-ईरान की महत्वपूर्ण रणनीतिक परियोजना चाबहार पोर्ट को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं। हालांकि मौजूदा हालात के कारण परियोजना की रफ्तार धीमी पड़ने की आशंका है, लेकिन यह पूरी तरह बंद नहीं हुई है और दोनों देश इसे जारी रखने के पक्ष में हैं।

ईरान के दक्षिण-पूर्व में ओमान की खाड़ी पर स्थित चाबहार पोर्ट भारत के लिए केवल व्यापारिक परियोजना नहीं बल्कि एक अहम भू-राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है। भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने के लिए इस बंदरगाह को वैकल्पिक मार्ग के रूप में देखता है। भारत अब तक शाहिद बेहिश्ती टर्मिनल के विकास पर 120 मिलियन डॉलर से अधिक का निवेश कर चुका है।

दरअसल भारत और अफगानिस्तान के बीच सीधा जमीनी रास्ता पाकिस्तान के कारण संभव नहीं है। ऐसे में चाबहार पोर्ट भारत को समुद्र के रास्ते ईरान तक माल पहुंचाने और वहां से सड़क व रेल नेटवर्क के जरिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक व्यापार करने का अवसर देता है।

यह बंदरगाह इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर (INSTC) का भी अहम हिस्सा है, जो भारत को ईरान, अज़रबैजान और रूस के जरिए यूरोप से जोड़ता है। इससे भारत का सामान कम समय और कम लागत में अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंच सकता है।

रणनीतिक दृष्टि से भी चाबहार का महत्व काफी बड़ा है। पाकिस्तान में चीन द्वारा विकसित ग्वादर पोर्ट के मुकाबले भारत की मौजूदगी को मजबूत करने में यह परियोजना अहम भूमिका निभाती है। ग्वादर और चाबहार के बीच दूरी लगभग 170 किलोमीटर है, इसलिए इसे चीन-पाकिस्तान के समुद्री प्रभाव के संतुलन के रूप में भी देखा जाता है।

हालांकि मौजूदा युद्ध और क्षेत्रीय तनाव ने इस परियोजना को लेकर कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। सुरक्षा जोखिम बढ़ने से जहाजों की आवाजाही, बीमा और लॉजिस्टिक लागत पर असर पड़ सकता है। साथ ही फारस की खाड़ी के समुद्री मार्गों में तनाव बढ़ने से अंतरराष्ट्रीय शिपिंग कंपनियां भी सतर्क हो गई हैं।

ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंध भी इस परियोजना की बड़ी चुनौती बने हुए हैं। हालांकि अफगानिस्तान तक मानवीय सहायता और व्यापार पहुंचाने के कारण भारत को इस परियोजना के लिए अमेरिका से सीमित छूट मिलती रही है, लेकिन अगर प्रतिबंध सख्त होते हैं तो निवेश और संचालन मुश्किल हो सकता है।

फिलहाल भारत ने इस परियोजना में नई फंडिंग पर अस्थायी रोक लगा दी है और 2026-27 के बजट में इसके लिए नई राशि का प्रावधान नहीं किया गया है। हालांकि इसे परियोजना से पीछे हटना नहीं बल्कि मौजूदा हालात को देखते हुए अस्थायी विराम माना जा रहा है। भारत और ईरान दोनों ही इसे लंबे समय के रणनीतिक निवेश के रूप में देखते हैं।