Samwad 2025 Manoj Muntashir Talk In Amar Ujala Samwad 2025 Lucknow Aadipurush Row And Life Lessons – Amar Ujala Hindi News Live – Samwad 2025:संवाद के मंच पर मनोज मुंतशिर, कहा

अमर उजाला संवाद 2025 के मंच पर मनोज मुंतशिर ने अपने करियर, लेखन, कविता, शेर-ओ-शायरी, फिल्मों के डायलॉग और शोहरत की बुलंदियों को छूने के बाद के जीवन जैसे पहलुओं पर विस्तार से बात की। संवाद 2025 के मंच पर मनोज मुंतशिर ने सबसे पहले इस बात का उल्लेख किया कि अमर उजाला के साथ उनका खास नाता है। उन्होंने बताया कि साल 2017 में जीवन का पहला बड़ा मंच अमर उजाला ने कानपुर में दिया था। वे इस बात के लिए आज भी ऋणी हैं कि पहली बार हजारों लोगों के सामने बोलने का अवसर मुझे अमर उजाला ने दिया। इसका मैं शुक्रगुजार हूं।

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मनोज मुंतशिर ने कहा, लखनऊ से क्या झूठ बोलना। इसका दुख हमेशा रहा कि मैंने उस फिल्म (आदिपुरुष) के संवाद लिखे। वो खराब थे, अशोभनीय थे। हालांकि, फिल्म के गीत हिट हुए। उसके लिए थोड़ा सा श्रेय मुझे मिल जाता तो अच्छा तो लगता। 

लखनऊ के लोगों को नाराजगी का हक है

मेरे घर के बगल की दुकान का पनवाड़ी भी मुझे नहीं पहचानता था कि मैं कौन हूं। तो जितनी बार लोग मुझसे नाराज होंगे, मैं सवाल पूछने नहीं, सिर्फ माफी मांगने आऊंगा। लोगों को नाराजगी का हक है। 

भटकाव के बाद राम की शरण

जीत ने अंधा कर दिया है तुझे, तुझको एक हार की जरूरत है… मुझे यह मानने में आज कोई संकोच नहीं है कि हां, मैं अपनी जड़ से थोड़ा भटक गया था। मुझे फिल्म आदिपुरुष की जरूरत थी, एक हार की जरूरत थी ताकि मैं अपनी जड़ों की ओर लौटूं। हर कोई मुश्किल में श्रीराम की शरण में जाता है, मैं भी उनकी शरण में गया।

कविता किया है? मनोज मुंतशिर से जानिए

मनोज मुंतशिर ने कहा, जीवन के इस पड़ाव पर उन्हें लगता है कि आदिपुरुष जैसी घटना होनी ही थी। इसी के बाद उन्हें अपनी गलतियों का एहसास हुआ, लेकिन जनता ने उन्हें माफ भी किया। मनोज ने कहा कि आदिपुरुष के बाद वे भक्ति गीत लिख रहे हैं। उन्होंने अमेरिकी कवयित्री एमिली डिकिंसन के कथन का उल्लेख किया और कहा कि जब तक भगवान आपको संकेत नहीं करते आप एक भी शब्द नहीं रच सकते।

मशूहूर रचनाकारों की नज्म के अंश भी पढ़े

उन्होंने फैज-अहमद फैज की मशहूर रचना- तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है, साहिल लुधियानवी की नज्म- ये दुनिया अगर मिल भी जाए, नरोत्तम दास की भक्ति कविता- मेरे हिय हरि के पद पंकज बार हजार लै देख परीक्षा औरन को धन चाहिए बावरी, ब्राह्मण को धन चाहिए बावरी, ब्राह्मण को धन केवल भिक्षा जैसी रचनाएं नहीं लिखी जा सकतीं।

सबसे अधिक किस परंपरा से जुड़ाव महसूस करते हैं?

मनोज मुंतशिर: 18 मार्च, 1999 को गौरीगंज से निकला था। 362 रुपये का टिकट लेकर मुंबई जाने के लिए चारबाग स्टेशन से पुष्पक एक्सप्रेस पकड़ी थ। उस समय दिमाग में इतना स्पष्ट था कि साहित्य और लोकप्रियता के बीच क्या कोई ऐसी जगह है जहां साहित्य आम लोगों से जुड़े। क्या कोई ऐसी जगह है जहां संगम हो सकता है? मुझे फिल्मी गीतों में यह क्षमता दिखी।

मनोज ने दीवान-ए-गालिब का उदाहरण देकर समझाया;

दीवान-ए-गालिब के पहले पन्ने पर जो नज्म लिखी है– नक्श फरियादी है जिसकी शोखी-ए-तहरीर का… फिल्मों का गीतकार जब इसे आसान भाषा में बयां करता है तो लिरिक्स- तुम बिन जिया जाए कैसे, कैसे जिया जाए तुम बिन बन जाता है। इस गीत में भी बिल्कुल वही बात लिखी है, जो गालिब की नज्म में है।