एक रूप या अनेक? भगवान की पूजा पर कितना मिलता है फल—प्रेमानंद महाराज का स्पष्ट उत्तर

17 January 2026 Fact Recorder

Rashifal Desk:  वृंदावन के प्रसिद्ध संत और आध्यात्मिक गुरु प्रेमानंद महाराज अपने सरल लेकिन गहरे प्रवचनों के लिए जाने जाते हैं। केली कुंज आश्रम में होने वाले उनके एकांतिक प्रवचनों में देश-विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं और जीवन, भक्ति व धर्म से जुड़े सवालों के उत्तर पाते हैं।

इन्हीं प्रवचनों के दौरान एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज से घर-घर में होने वाली पूजा से जुड़ा एक अहम सवाल पूछा। भक्त ने कहा कि उसके घर के मंदिर में भगवान की कई प्रतिमाएं हैं और उसकी माता सभी देवी-देवताओं की नियमित पूजा करती हैं। सवाल यह था कि क्या भगवान के अनेक रूपों या कई प्रतिमाओं की पूजा करने से अधिक पुण्य या फल मिलता है?

“भगवान एक हैं, रूप अनेक”—प्रेमानंद महाराज

सवाल सुनकर प्रेमानंद महाराज मुस्कुराए और बड़ी सहजता से उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि भगवान एक ही हैं, लेकिन उनके रूप अनंत हैं। आप चाहे जितने भी रूपों की पूजा कर लें, अंत में फल एक ही मिलता है।

महाराज ने समझाया कि जब भक्त कई रूपों की पूजा करता है, तो उसका भाव बंट जाता है। हजार जगह पूजा करने से भक्ति की एकाग्रता कम हो जाती है और उसी अनुपात में फल भी घट जाता है। इसके विपरीत, जो भक्त भगवान के एक ही रूप को पूरी श्रद्धा और प्रेम के साथ स्वीकार करता है, उसे अधिक फल प्राप्त होता है।

एक रूप में सभी रूपों का दर्शन

प्रेमानंद महाराज ने उदाहरण देते हुए कहा कि रामकृष्ण परमहंस ने मां काली की पूजा की और उसी में सभी देवी-देवताओं के दर्शन किए। तुलसीदास जी ने भगवान राम को अपना आराध्य माना और उन्हें हर जगह सियाराम ही दिखाई दिए। इसी तरह गोपियों ने श्रीकृष्ण को स्वीकार किया और पूरे जगत में श्याम को ही देखा।

प्रेम और भक्ति की असली राह

महाराज ने कहा कि प्रेम हमेशा एक ही जगह टिकता है। अगर भगवान से सच्चा प्रेम करना है, तो उनके किसी एक रूप को अपने हृदय में स्थापित करना चाहिए। उसी नाम का जप, उसी रूप की पूजा और उसी भाव से भक्ति करने पर मन एकाग्र होता है और ईश्वर कृपा सहज रूप से प्राप्त होती है।

निष्कर्ष:
भगवान के अनेक रूपों की पूजा करना गलत नहीं है, लेकिन अधिक फल की इच्छा हो तो एक रूप में पूर्ण श्रद्धा और प्रेम रखना ही श्रेष्ठ मार्ग है। भक्ति की शक्ति संख्या में नहीं, भाव और एकाग्रता में होती है—यही प्रेमानंद महाराज का संदेश है।