2010 से JDU का गढ़ बनी कल्याणपुर विधानसभा सीट, जानिए अब तक का चुनावी सफर

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25 जुलाई 2025 फैक्टर रिकॉर्डर

Politics Desk: कल्याणपुर विधानसभा सीट: लगातार JDU का गढ़, आरक्षण के बाद बदला सियासी समीकरण  बिहार विधानसभा चुनाव से जुड़ी खास सीरीज ‘सीट का समीकरण’ में आज बात समस्तीपुर जिले की कल्याणपुर विधानसभा सीट की, जिसका राजनीतिक इतिहास काफी रोचक रहा है। 2008 में हुए परिसीमन से पहले यह सामान्य सीट थी, लेकिन इसके बाद इसे अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित कर दिया गया। इसके बाद से इस सीट का सियासी समीकरण पूरी तरह बदल गया और JDU का इस सीट पर वर्चस्व बढ़ता गया।

कल्याणपुर विधानसभा सीट का परिचय
समस्तीपुर जिले की कल्याणपुर सीट, समस्तीपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आती है। जिले की अन्य प्रमुख विधानसभा सीटों में वारिसनगर, समस्तीपुर, उजियारपुर, रोसड़ा और हसनपुर शामिल हैं।

1967: पहली बार हुआ था चुनाव
कल्याणपुर विधानसभा सीट पर पहला चुनाव 1967 में हुआ था, जिसमें संघटा सोशलिस्ट पार्टी के ब्रह्मदेव नारायण सिंह ने जीत हासिल की थी। इसके बाद 1969 में भी उन्होंने जीत दर्ज की।

1977: जनता पार्टी की लहर
आपातकाल के बाद 1977 में जनता पार्टी के बशिष्ठ नारायण सिंह ने कांग्रेस को हराकर सीट पर कब्जा किया।

1980 से 2005: उठा-पटक का दौर
1980 में कांग्रेस की राम सुकुमारी देवी ने वापसी की और पहली महिला विधायक बनीं।

1985 में बशिष्ठ नारायण सिंह (लोकदल) ने दोबारा जीत हासिल की।

1990 में कांग्रेस के दिलीप कुमार राय जीते।

1995 में जनता दल की सीता सिन्हा ने जीत दर्ज की।

2000 में समता पार्टी की अश्वमेघ देवी ने राजद के आलोक मेहता को हराया।

फरवरी 2005 में राजद के अशोक प्रसाद वर्मा ने जीत दर्ज की।

अक्टूबर 2005 में जदयू की अश्वमेघ देवी ने वापसी की।

2009 के लोकसभा चुनाव के बाद हुए उपचुनाव में फिर से राजद के अशोक प्रसाद वर्मा जीते।

2010 के बाद: जदयू का वर्चस्व
2008 में सीट के आरक्षित होते ही राजनीति की तस्वीर बदल गई।

2010 में जदयू के रामसेवक हजारी ने बड़ी जीत हासिल की।

उनके निधन के बाद 2012 में उपचुनाव में जदयू की मंजू देवी विधायक बनीं।

2015 और 2020 दोनों चुनावों में महेश्वर हजारी (JDU) ने जीत दर्ज की।

2015 में उन्होंने लोजपा के प्रिंस राज को हराया।

2020 में उन्होंने भाकपा के रंजीत कुमार राम को 10,251 वोटों से हराया।

निष्कर्ष
कल्याणपुर सीट ने समय के साथ कई राजनीतिक दलों को आजमाया, लेकिन आरक्षण लागू होने के बाद से यह JDU का मजबूत किला बन चुकी है। आने वाले विधानसभा चुनावों में देखना दिलचस्प होगा कि क्या जदयू इस सीट पर अपनी पकड़ बनाए रखेगी या कोई नया चेहरा इसे तोड़ेगा।