मोबाइल, Wi-Fi और 5G से क्या वाकई होता है कैंसर? बढ़ते मामलों के बीच जानिए वैज्ञानिक सच्चाई

02 फरवरी 2026 फैक्ट रिकॉर्डर

Health Desk:  दुनियाभर में कैंसर के बढ़ते मामलों ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। साल 2022 में करीब 2 करोड़ नए कैंसर केस सामने आए, जबकि 97 लाख से ज्यादा लोगों की इस बीमारी से मौत हो गई। विशेषज्ञों का अनुमान है कि 2050 तक यह आंकड़ा 3.5 करोड़ से भी ज्यादा हो सकता है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर कैंसर के मामले इतनी तेजी से क्यों बढ़ रहे हैं? क्या इसके पीछे मोबाइल फोन, वाई-फाई और 5G जैसी आधुनिक तकनीकें जिम्मेदार हैं?

क्यों बढ़ रहे हैं कैंसर के मामले?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, कैंसर के बढ़ते मामलों के पीछे मुख्य कारण शहरीकरण, बदलती जीवनशैली, खानपान में मिलावट, पर्यावरण प्रदूषण, तंबाकू और शराब का सेवन हैं। इसके अलावा फास्ट फूड, प्रोसेस्ड और ज्यादा तला-भुना भोजन भी शरीर में कैंसरकारी तत्वों को बढ़ाता है। हालांकि बीते कुछ वर्षों में मोबाइल, वाई-फाई और 5G के बढ़ते इस्तेमाल ने लोगों के मन में यह डर पैदा कर दिया है कि कहीं इनसे निकलने वाला रेडिएशन कैंसर का कारण तो नहीं।

मोबाइल फोन से कैंसर का खतरा?

कैंसर रिसर्च यूके और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की रिपोर्ट्स के मुताबिक, मोबाइल फोन से कैंसर होने का कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। मोबाइल फोन रेडियोफ्रीक्वेंसी रेडिएशन का इस्तेमाल करते हैं, जो नॉन-आयोनाइजिंग रेडिएशन होता है। यह डीएनए को नुकसान पहुंचाने या कैंसर पैदा करने के लिए पर्याप्त शक्तिशाली नहीं होता।

कुछ लोगों को यह चिंता रहती है कि फोन को कान से लगाकर बात करने या जेब में रखने से ब्रेन या ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ सकता है, लेकिन अब तक के बड़े अध्ययनों में ऐसा कोई सीधा संबंध साबित नहीं हो पाया है।

वाई-फाई और ब्लूटूथ कितने सुरक्षित?

विशेषज्ञों के अनुसार, वाई-फाई और ब्लूटूथ भी उसी तरह की कमजोर रेडियो तरंगों का इस्तेमाल करते हैं जैसी रेडियो और टीवी में होती हैं। ये तरंगें डीएनए को नुकसान नहीं पहुंचातीं, इसलिए इनसे कैंसर होने का खतरा नहीं माना जाता।

5G को लेकर क्या कहते हैं वैज्ञानिक?

5G तकनीक को लेकर भी कई तरह की आशंकाएं सामने आई हैं। हालांकि वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन (WHO), इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) और कैंसर रिसर्च यूके जैसे संस्थानों का कहना है कि 5G नेटवर्क से कैंसर होने का कोई भरोसेमंद सबूत नहीं है। 5G नॉन-आयोनाइजिंग रेडियो तरंगों का उपयोग करता है, जिनकी एनर्जी लेवल सुरक्षित सीमा के भीतर होती है और ये डीएनए को सीधे नुकसान नहीं पहुंचातीं।

निष्कर्ष

वैज्ञानिक शोधों के आधार पर यह साफ है कि मोबाइल, वाई-फाई और 5G से कैंसर होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिला है। कैंसर का बढ़ता खतरा मुख्य रूप से जीवनशैली, खानपान, तंबाकू-शराब और पर्यावरण प्रदूषण से जुड़ा है। ऐसे में डरने के बजाय स्वस्थ जीवनशैली अपनाना, नियमित जांच कराना और जागरूक रहना ही सबसे बेहतर उपाय माना जाता है।