चंडीगढ़, 09 January 2026 Fact Recorder
Chandigarh Desk: चंडीगढ़ प्रशासन के बिजली विभाग से निजी कंपनी सीपीडीएल में भेजे गए कर्मचारियों के साथ गंभीर अन्याय किए जाने के आरोप सामने आए हैं। यूनियन का कहना है कि 1 फरवरी 2025 को प्रशासन द्वारा बिना सहमति और विकल्प दिए लगभग 349 कर्मचारियों को एक वर्ष के लिए अस्थायी तौर पर निजी कंपनी सीपीडीएल में भेज दिया गया, जिसके बाद से कर्मचारी लगातार परेशानियों का सामना कर रहे हैं।
यूनियन के अनुसार, इन कर्मचारियों में से पांच ने नौकरी छोड़ दी, जबकि पांच कर्मचारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इसके अलावा एक कर्मचारी ने करीब पांच महीने पहले वीआरएस (स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति) के लिए आवेदन किया था, लेकिन अब तक उसे मंजूरी नहीं मिली है। प्रशासन इस पर कोई निर्णय नहीं ले रहा, जबकि कंपनी का कहना है कि उनके पास वीआरएस की कोई योजना ही नहीं है। यूनियन ने इसे अमानवीय स्थिति बताते हुए कहा कि संबंधित कर्मचारी गंभीर बीमारी की अवस्था में है और उसे कोई राहत नहीं मिल रही।
सबसे गंभीर आरोप यह है कि पिछले 11 महीनों में सेवानिवृत्त हुए पांच कर्मचारियों को अब तक रिटायरमेंट का एक भी लाभ नहीं दिया गया है। न तो ग्रेच्युटी, न पेंशन और न ही कर्मचारियों द्वारा जमा किया गया जीपीएफ जारी किया गया है। इसके विपरीत, चंडीगढ़ प्रशासन से एक महीने पहले सेवानिवृत्त हुए कर्मचारियों को उनके सभी सेवानिवृत्ति लाभ समय पर मिल चुके हैं। यूनियन का आरोप है कि जिन कर्मचारियों ने 37 से 40 साल तक सेवा दी और जिन्हें जबरन निजी कंपनी में भेजा गया, उन्हें सेवानिवृत्ति के नौ महीने बाद भी उनके बकाया भुगतान नहीं किए जा रहे हैं।
आज आयोजित प्रेस वार्ता में यूनियन के प्रधान अमरीक सिंह, उप प्रधान गुरमीत सिंह और महासचिव गोपाल दत्त जोशी ने इंजीनियरिंग विभाग के अधिकारियों और निजी कंपनी दोनों को इस स्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रशासन और कंपनी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालकर मामले से पल्ला झाड़ रहे हैं और बदले की भावना से काम किया जा रहा है।
यूनियन नेताओं ने यह भी आरोप लगाया कि पिछले पांच महीनों से कर्मचारियों को हाउस लोन, बच्चों की शादी जैसे जरूरी कार्यों के लिए नियमों के तहत मिलने वाला जीपीएफ भी नहीं दिया जा रहा है, जिससे कर्मचारी दर-दर भटकने को मजबूर हैं।
इसके साथ ही यूनियन ने निजीकरण की प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। पदाधिकारियों का कहना है कि केंद्र सरकार का निर्णय केवल बिजली वितरण (डिस्ट्रिब्यूशन) के निजीकरण तक सीमित था, जबकि ट्रांसमिशन के असैट्स को कंपनी को सौंपना नियमों के खिलाफ है। यदि ट्रांसमिशन के असैट्स निजी कंपनी को न दिए जाते, तो करीब 250 कर्मचारियों को विभाग में ही समायोजित किया जा सकता था। यूनियन ने आरोप लगाया कि गलत आरएफपी बनाकर नियमों का उल्लंघन किया गया है।
यूनियन ने प्रशासक महोदय से इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग करते हुए दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई और नियमानुसार जुर्माना लगाने की अपील की है। साथ ही जांच पूरी होने तक एसटीयू के असैट्स निजी कंपनी को हैंडओवर न करने की मांग की गई है। यूनियन ने चेतावनी दी है कि शीघ्र ही बैठक बुलाकर आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया जाएगा और इस प्रकरण में शामिल अधिकारियों की भूमिका सार्वजनिक की जाएगी।













