31 मार्च 2026 फैक्ट रिकॉर्डर
Sports Desk: भारतीय खेल इतिहास में कुछ कहानियां सिर्फ जीत की नहीं, बल्कि जज्बे और हिम्मत की मिसाल होती हैं। Leander Paes का 1996 अटलांटा ओलंपिक में जीता गया कांस्य पदक ऐसी ही एक प्रेरणादायक कहानी है, जिसने पूरे देश को गर्व से भर दिया।
Leander Paes ने न केवल भारत को 44 साल बाद व्यक्तिगत ओलंपिक पदक दिलाया, बल्कि टेनिस में ओलंपिक मेडल जीतने वाले पहले भारतीय और एशियाई खिलाड़ी भी बने। इस उपलब्धि ने भारतीय टेनिस को नई पहचान दी और कई युवा खिलाड़ियों को प्रेरित किया।
कोलकाता में जन्मे पेस एक खेल परिवार से आते हैं। उनके पिता वेस पेस 1972 म्यूनिख ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम का हिस्सा थे, जबकि उनकी मां जेनिफर पेस अंतरराष्ट्रीय स्तर की बास्केटबॉल खिलाड़ी रहीं।
अटलांटा ओलंपिक 1996 में पेस को वाइल्ड कार्ड एंट्री मिली थी और उनकी विश्व रैंकिंग 126 थी, लेकिन उन्होंने इस मौके को शानदार तरीके से भुनाया। शुरुआती मुकाबलों में बेहतरीन प्रदर्शन करते हुए वे सेमीफाइनल तक पहुंचे। हालांकि, सेमीफाइनल में हार के बाद उनकी कलाई में गंभीर चोट लग गई थी।
कांस्य पदक मुकाबले में उनका सामना ब्राजील के फर्नांडो मेलिगेनी से हुआ। पेस पहला सेट हार चुके थे और दूसरे सेट में भी पिछड़ रहे थे, लेकिन यहीं से उन्होंने जबरदस्त वापसी की। दर्द और चोट के बावजूद उन्होंने मैच को पलटते हुए 3-6, 6-2, 6-4 से जीत हासिल की।
यह जीत सिर्फ एक पदक नहीं थी, बल्कि मानसिक मजबूती और देश के लिए खेलने के जुनून की मिसाल थी। पेस ने खुद भी माना कि उस दिन जीत शरीर से नहीं, बल्कि दिमाग और आत्मविश्वास से मिली थी।
आज भी Leander Paes का यह ‘जादुई’ पल भारतीय खेल इतिहास के सबसे गौरवपूर्ण क्षणों में गिना जाता है, जिसने आने वाली पीढ़ियों को बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने की प्रेरणा दी।













