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भारत में तेजी से बढ़ रहा कैंसर का खतरा, 2050 तक हर साल सामने आ सकते हैं 28 लाख नए मामले

November 5,2026 Fact Recorder

Health  Desk:  भारत में कैंसर के मामले आने वाले वर्षों में बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन सकते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, जनसंख्या वृद्धि और बुजुर्गों की बढ़ती आबादी के चलते वर्ष 2050 तक देश में हर साल कैंसर के नए मरीजों की संख्या करीब 28 लाख तक पहुंच सकती है। चिंता की बात यह भी है कि बड़ी संख्या में मरीजों में बीमारी का पता तब चलता है, जब कैंसर काफी आगे बढ़ चुका होता है।

इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) के GLOBOCAN 2022 अनुमानों के अनुसार, भारत में उस वर्ष कैंसर के करीब 14.13 लाख नए मामले सामने आए थे, जबकि 9.16 लाख लोगों की मौत हुई थी। वहीं, 2024 के अनुमानों में नए मामलों की संख्या लगभग 16 लाख बताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, हर 10 में से करीब एक भारतीय को 75 वर्ष की उम्र से पहले कैंसर होने का जोखिम है।

कम उम्र के लोगों में भी बढ़ रहे कैंसर के मामले

आकाश हेल्थकेयर में सर्जिकल ऑन्कोलॉजी के निदेशक डॉ. अरुण कुमार गिरी के अनुसार, कैंसर मरीजों की उम्र में बदलाव देखने को मिल रहा है। अब 30 और 40 साल की उम्र के लोग भी कैंसर के इलाज के लिए अस्पताल पहुंच रहे हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, तंबाकू का सेवन, असंतुलित खानपान, शारीरिक गतिविधियों की कमी और प्रदूषण जैसे कारक कैंसर का जोखिम बढ़ा सकते हैं। यह बीमारी अब केवल बड़े महानगरों तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे शहरों और कस्बों में भी इसके मरीज सामने आ रहे हैं।

देर से बीमारी का पता चलना बन रहा बड़ी समस्या

जुपिटर हॉस्पिटल के ऑन्कोलॉजी कंसल्टेंट डॉ. प्रतीक पाटिल बताते हैं कि कई मरीज अस्पताल तब पहुंचते हैं, जब कैंसर तीसरे या चौथे चरण में पहुंच चुका होता है। ऐसी स्थिति में इलाज अधिक जटिल हो सकता है और खर्च भी बढ़ जाता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, शरीर में गांठ, लंबे समय तक ठीक न होने वाला घाव, बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन घटना और असामान्य रक्तस्राव जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। सही समय पर जांच और विशेषज्ञ से सलाह लेने से बीमारी की पहचान में मदद मिल सकती है।

महिलाओं और पुरुषों में जांच को लेकर लापरवाही

कैंसर की शुरुआती पहचान के लिए नियमित जांच बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन कई लोग स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को लेकर खुलकर बात नहीं करते।

डॉ. विनीत मल्होत्रा के अनुसार, कई पुरुष तब तक जांच कराने से बचते हैं, जब तक लक्षण गंभीर न हो जाएं। तंबाकू और शराब के सेवन के साथ-साथ मूत्र और यौन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं पर बात करने में झिझक भी जांच में देरी का कारण बनती है।

वहीं, गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. अर्चना धवन बजाज के मुताबिक, महिलाओं में सर्वाइकल कैंसर से बचाव के लिए HPV वैक्सीन और नियमित स्क्रीनिंग महत्वपूर्ण हैं। इसके बावजूद कई महिलाएं पैप स्मीयर और HPV टेस्ट नहीं करातीं। असामान्य रक्तस्राव, लगातार डिस्चार्ज और स्तन में गांठ जैसे लक्षणों को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

कैंसर के इलाज का खर्च परिवारों पर डाल रहा आर्थिक बोझ

कैंसर की पहचान होने के बाद मरीजों और उनके परिवारों के सामने इलाज का खर्च बड़ी चुनौती बन जाता है। रेडिएशन, सर्जरी और आधुनिक उपचार की सुविधाएं मुख्य रूप से बड़े शहरों में उपलब्ध होने के कारण छोटे शहरों के मरीजों को बार-बार लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

डॉ. प्रतीक पाटिल के मुताबिक, यात्रा, अस्पताल के पास रहने, काम से छुट्टी लेने और इलाज पर होने वाला खर्च परिवारों की आर्थिक स्थिति पर भारी पड़ सकता है। कई परिवारों को इसके लिए कर्ज तक लेना पड़ता है। आर्थिक परेशानियों के चलते कुछ मरीज इलाज बीच में छोड़ने को भी मजबूर हो जाते हैं।

समय पर जांच और जागरूकता जरूरी

विशेषज्ञों का मानना है कि कैंसर के बढ़ते खतरे से निपटने के लिए जागरूकता, समय पर जांच और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच जरूरी है। तंबाकू से दूरी, संतुलित खानपान, नियमित शारीरिक गतिविधि और डॉक्टर की सलाह के अनुसार स्क्रीनिंग कराने से कैंसर के जोखिम को कम करने और बीमारी की समय पर पहचान में मदद मिल सकती है।