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हिमाचल में 54 साल बाद नए जिले बनाने पर चर्चा तेज, सुक्खू सरकार के आयोग की रिपोर्ट पर टिकी निगाहें

October 15,2026 Fact Recorder

Himachal Desk:  हिमाचल प्रदेश में पांच दशक से अधिक समय बाद नए जिले बनाने की संभावनाओं को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेतृत्व वाली प्रदेश सरकार ने प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन के लिए आयोग का गठन किया है। अब इस आयोग की रिपोर्ट पर सभी की निगाहें टिकी हैं। हालांकि, सरकार की ओर से अभी तक किसी नए जिले के गठन की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।

प्रदेश में लंबे समय से कई क्षेत्रों को जिला, उपमंडल और तहसील बनाने की मांग उठती रही है। आयोग के गठन के बाद इन मांगों को लेकर उम्मीदें बढ़ी हैं, लेकिन अंतिम फैसला प्रशासनिक जरूरतों और वित्तीय स्थिति को ध्यान में रखकर ही लिया जाएगा।

वीरभद्र सिंह सरकार के समय भी उठी थी जिले की मांग

हिमाचल प्रदेश में नए जिलों के गठन की मांग पुरानी है। पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के कार्यकाल में रामपुर को जिला बनाने की मांग उठी थी, लेकिन उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया था। वह संगठनात्मक जिलों के गठन के भी पक्ष में नहीं थे। उनका मानना था कि भविष्य में संगठनात्मक जिले भी प्रशासनिक जिले बनाने की मांग कर सकते हैं, जिससे सरकारी खर्च में वृद्धि होगी।

इसके बाद प्रेम कुमार धूमल और जयराम ठाकुर की सरकारों के दौरान भी नए जिले बनाने की मांग उठती रही। हालांकि, नए जिले नहीं बनाए गए। इस दौरान सोलन जिले के बद्दी, कांगड़ा जिले के नूरपुर और देहरा में पुलिस जिले बनाए गए तथा वहां पुलिस अधीक्षकों की तैनाती की गई।

1972 में बने थे आखिरी तीन नए जिले

हिमाचल प्रदेश में आखिरी बार 1 सितंबर 1972 को जिलों का पुनर्गठन किया गया था। उस समय हमीरपुर, ऊना और सोलन को नए जिले बनाया गया था। इसके बाद से प्रदेश में जिलों की संख्या 12 बनी हुई है।

वर्तमान में हिमाचल प्रदेश में 12 जिले, 81 उपमंडल, 92 विकास खंड और 193 तहसीलें व उपतहसीलें हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में प्रशासनिक सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए नई इकाइयों के गठन की मांग लगातार उठती रही है।

नए जिले बनाने में सबसे बड़ी चुनौती होगा खर्च

हिमाचल प्रदेश की आर्थिक स्थिति को देखते हुए नए जिलों का गठन सरकार के लिए आसान फैसला नहीं होगा। प्रदेश पर करीब 1.04 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। ऐसे में सरकार को प्रशासनिक सुविधाओं के विस्तार के साथ-साथ वित्तीय संसाधनों का भी ध्यान रखना होगा।

नया जिला बनने पर उपायुक्त, अतिरिक्त उपायुक्त, अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी, पुलिस अधीक्षक समेत अन्य अधिकारियों की नियुक्ति करनी पड़ती है। इसके अलावा विभिन्न विभागों के कार्यालय, सरकारी भवन, वाहन और कर्मचारियों की व्यवस्था भी करनी होती है। इन सभी व्यवस्थाओं से सरकारी खजाने पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है।

विधानसभा में सरकार ने नए जिलों का प्रस्ताव होने से किया था इनकार

भाजपा विधायक डॉ. जनक राज ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र में चार नए जिले बनाने की संभावनाओं और एक नया जिला गठित करने पर आने वाले खर्च को लेकर सवाल उठाया था। इस पर मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू ने सदन में स्पष्ट किया था कि नए जिलों के गठन का कोई प्रस्ताव सरकार के पास विचाराधीन नहीं है।

अब प्रशासनिक इकाइयों के पुनर्गठन के लिए आयोग गठित किए जाने के बाद इस विषय पर नए सिरे से चर्चा शुरू हुई है। हालांकि, आयोग का गठन अपने आप में नए जिले बनाने की मंजूरी नहीं है। आगे की स्थिति आयोग की रिपोर्ट और सरकार के फैसले पर निर्भर करेगी।

1948 में चार जिलों से शुरू हुआ था हिमाचल का सफर

हिमाचल प्रदेश के गठन के समय 15 अप्रैल 1948 को राज्य में महासू, मंडी, चंबा और सिरमौर सहित चार जिले थे। इसके बाद अलग-अलग चरणों में प्रशासनिक बदलाव किए गए।

  • 1960: कांगड़ा, लाहुल-स्पीति, कुल्लू और शिमला जिले बने।

  • 1966: महासू जिले का अस्तित्व समाप्त होने के बाद किन्नौर जिला बना।

  • 1972: हमीरपुर, ऊना और सोलन के गठन के साथ जिलों की संख्या 12 हो गई।

तब से लेकर अब तक प्रदेश में जिलों की संख्या में कोई बदलाव नहीं हुआ है। अब आयोग की रिपोर्ट से यह स्पष्ट होने की उम्मीद है कि बदलती प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार प्रदेश में किस तरह के पुनर्गठन की आवश्यकता है।

कांगड़ा को दूसरी राजधानी का दर्जा, अब पर्यटन राजधानी

पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने अपने कार्यकाल के दौरान कांगड़ा को दूसरी राजधानी का दर्जा दिया था। इसका उद्देश्य शीतकालीन प्रवास और विधानसभा सत्र के माध्यम से लोगों को प्रशासनिक कार्यों के लिए बार-बार शिमला जाने से राहत देना था। हालांकि, दूसरी राजधानी की व्यवस्था अपेक्षित रूप से जमीन पर नहीं उतर सकी।

वर्तमान सरकार ने कांगड़ा को पर्यटन राजधानी घोषित किया है। अब प्रदेश में नए जिले बनाने को लेकर चल रही चर्चा के बीच लोगों की निगाहें आयोग की रिपोर्ट पर टिकी हैं। यदि भविष्य में नए जिलों के गठन का फैसला होता है, तो इससे कई क्षेत्रों की प्रशासनिक व्यवस्था और विकास की दिशा में बदलाव आ सकता है।