September 11,2026 Fact Recorder
Himachal Desk: हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में भूस्खलन का खतरा लगातार बढ़ रहा है। अब एक वैज्ञानिक अध्ययन ने पहली बार यह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि भूस्खलन से संवेदनशील क्षेत्रों में कितनी इमारतें सीधे खतरे की जद में हैं। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मंडी के डेक्सटर लैब द्वारा किए गए इस अध्ययन में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और मशीन लर्निंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया है।
अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका Artificial Intelligence in Geosciences में प्रकाशित इस शोध में भूस्खलन संवेदनशीलता के नक्शों को भवनों और बुनियादी ढांचे के वास्तविक आंकड़ों से जोड़ा गया। अध्ययन के परिणाम हिमाचल के कई प्रमुख जिलों के लिए चिंता बढ़ाने वाले हैं।
शिमला में 35% इमारतें हाई-रिस्क जोन में
अध्ययन के मुताबिक राजधानी शिमला में करीब 35 प्रतिशत इमारतें भूस्खलन के हाई-रिस्क जोन में स्थित हैं। यानी शिमला में हर तीन में से एक से अधिक इमारत भूस्खलन के संभावित खतरे वाले क्षेत्र में आती है।
वहीं पर्यटन नगरी कुल्लू में करीब 30 प्रतिशत, मंडी में 22 प्रतिशत और सोलन में 21 प्रतिशत भवन हाई-रिस्क जोन में पाए गए हैं। ये आंकड़े पहाड़ी क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण और बदलते पर्यावरणीय हालात के बीच चिंता बढ़ाने वाले हैं।
AI और मशीन लर्निंग से तैयार हुआ जोखिम आकलन
इस शोध को IIT मंडी के स्कूल ऑफ सिविल एंड एनवायरनमेंट इंजीनियरिंग के प्रोफेसर डॉ. डेरिक्स पी. शुक्ला के नेतृत्व में शोधार्थियों अंकित सिंह, नितेश धीमान और कीर्ति कुमार महंता ने तैयार किया है।
शोध में Random Forest, Support Vector Machine और Multilayer Perceptron जैसे उन्नत AI मॉडल का इस्तेमाल किया गया। इन तकनीकों के जरिए भूस्खलन से जुड़े आंकड़ों को भवनों और बुनियादी ढांचे के डेटा के साथ जोड़ा गया, जिससे अलग-अलग क्षेत्रों में वास्तविक जोखिम का आकलन किया जा सका।
कांगड़ा और किन्नौर में सामने आया अलग पैटर्न
अध्ययन में कांगड़ा और किन्नौर को लेकर एक अलग तस्वीर सामने आई है। इन जिलों में भूस्खलन की घटनाएं होने के बावजूद आबादी और भवनों पर इसका सीधा जोखिम अपेक्षाकृत कम पाया गया।
कांगड़ा में करीब 5 प्रतिशत और किन्नौर में 14 प्रतिशत इमारतें ही जोखिम वाले क्षेत्रों में आती हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, इन जिलों में कई भूस्खलन गैर-रिहायशी क्षेत्रों या खाली पहाड़ी ढलानों पर होते हैं।
वहीं ऊना, हमीरपुर और लाहौल-स्पीति जैसे मैदानी तथा जनजातीय क्षेत्रों में 90 प्रतिशत से अधिक निर्माण अपेक्षाकृत सुरक्षित क्षेत्रों में पाया गया।
शहरी नियोजन और आपदा प्रबंधन में मिलेगी मदद
शोधकर्ताओं का कहना है कि पारंपरिक भूस्खलन संवेदनशीलता नक्शे मुख्य रूप से ढलानों, मिट्टी और भौगोलिक परिस्थितियों की जानकारी देते हैं। AI आधारित अध्ययन ने इन आंकड़ों को वास्तविक भवनों और बुनियादी ढांचे से जोड़कर जोखिम का अधिक व्यावहारिक आकलन करने का रास्ता खोला है।
प्रोफेसर डॉ. डेरिक्स पी. शुक्ला के अनुसार, इस तरह के डेटा से शहरी नियोजकों और आपदा प्रबंधन अधिकारियों को संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने, निर्माण संबंधी फैसले लेने और भविष्य के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है।
हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य में लगातार बदलते मौसम, भारी बारिश और बढ़ते निर्माण के बीच यह अध्ययन भविष्य की आपदा प्रबंधन रणनीति के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।













