21 फरवरी 2026 फैक्ट रिकॉर्डर
International Desk: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सख्त व्यापार नीतियों को उस समय बड़ा झटका लगा, जब अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने उनके द्वारा लगाए गए ‘इमरजेंसी टैरिफ’ को असंवैधानिक करार दे दिया। इस हाई-प्रोफाइल कानूनी लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाने वाले भारतीय मूल के वकील नील कत्याल एक बार फिर वैश्विक चर्चा में आ गए हैं। खास बात यह रही कि जजों के बीच मत बराबर रहने पर सिक्का उछालकर फैसला किया गया, जो अंततः ट्रंप के खिलाफ गया।
कौन हैं नील कत्याल?
नील कत्याल का जन्म शिकागो में हुआ। वे भारतीय अप्रवासी माता-पिता की संतान हैं—पिता इंजीनियर और माता डॉक्टर रहीं। उन्होंने डार्टमाउथ कॉलेज से स्नातक और प्रतिष्ठित येल लॉ स्कूल से कानून की पढ़ाई की। अपने करियर की शुरुआत में उन्होंने अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश स्टीफन ब्रेयर के साथ लॉ क्लर्क के रूप में काम किया, जिसने उनकी कानूनी समझ को नई ऊंचाई दी।
ट्रंप के आदेश को अदालत में दी चुनौती
ट्रंप प्रशासन द्वारा लगाए गए आपातकालीन टैरिफ के खिलाफ नील कत्याल ने दलील दी कि राष्ट्रपति आपात शक्तियों के नाम पर संसद (कांग्रेस) के संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर सकते। कोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताते हुए स्पष्ट किया कि आयात शुल्क और व्यापार नीति तय करने का अधिकार विधायिका के पास है, न कि राष्ट्रपति की एकतरफा कार्यपालिका शक्तियों के पास।
अनुभव और प्रतिष्ठा
नील कत्याल वर्तमान में मिलबैंक एलएलपी में पार्टनर हैं और जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी में कानून के प्रोफेसर भी हैं। वे ओबामा प्रशासन के दौरान अमेरिका के कार्यवाहक सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं। अब तक वे 50 से अधिक मामलों में सुप्रीम कोर्ट के सामने दलीलें पेश कर चुके हैं। इससे पहले वे ट्रंप के विवादित ‘ट्रैवल बैन’ के खिलाफ भी अदालत में मजबूती से खड़े रहे थे।
सम्मान और उपलब्धियां
कानूनी जगत में उनकी विशेषज्ञता के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। ‘द अमेरिकन लॉयर’ ने उन्हें 2017 और 2023 में ‘लिटिगेटर ऑफ द ईयर’ चुना। इसके अलावा, उन्हें अमेरिकी न्याय विभाग के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘एडमंड रैंडॉल्फ अवॉर्ड’ से भी नवाजा गया है। उन्होंने ट्रंप के खिलाफ चर्चित किताब Impeach: The Case Against Donald Trump भी लिखी है।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के इस ताजा फैसले के बाद नील कत्याल न सिर्फ अमेरिका, बल्कि दुनिया भर में संवैधानिक मूल्यों और कानून के शासन की मजबूत आवाज के रूप में फिर से उभरे हैं।













