15 January 2026 Fact Recorder
Health Desk: आईसीएमआर अब भारत के बच्चों और किशोरों (0 से 18 साल) के लिए इंडियन हेल्थ स्टैंडर्ड्स बनाने की दिशा में काम कर रहा है। इसका मतलब यह है कि अब बच्चों की बीमारियों की पहचान और इलाज के लिए भारतीय मानक अपनाए जाएंगे, जबकि अभी तक देश में इलाज के लिए विदेशी पैरामीटर्स का उपयोग होता रहा है। इन विदेशी मानकों का आधार यूरोप या अमेरिका जैसी आबादी का डेटा होता है, जबकि भारतीय बच्चों की सेहत, पोषण, जीवनशैली और जेनेटिक्स अलग हैं।
अभी तक जिन टेस्टों और पैमानों पर इलाज किया जाता है, उनमें हीमोग्लोबिन, BMI, ग्रोथ चार्ट, ब्लड शुगर, लिपिड प्रोफाइल और थायरॉइड फंक्शन टेस्ट शामिल हैं। गाजियाबाद के जिला अस्पताल के पेडियाट्रिक विशेषज्ञ डॉ. विपिनचंद्र उपाध्याय बताते हैं कि विदेशी मानकों के कारण भारतीय बच्चों को गलत तरीके से “अंडरवेट” या “ओवरवेट” माना जाता है। उदाहरण के लिए, विदेशी ग्रोथ चार्ट में 8 साल के बच्चे का न्यूनतम वजन 28 किलो होना चाहिए, जबकि भारतीय बच्चों के लिए यह जरूरी नहीं। इसी तरह, हीमोग्लोबिन के स्तर भी भारत में अलग हो सकते हैं।
भारतीय मानक बनाने की सबसे बड़ी जरूरत गलत इलाज से बचाव और सटीक स्वास्थ्य सलाह देने के लिए है। इंडियन ग्रोथ चार्ट और हेल्थ स्टैंडर्ड्स के लागू होने से बच्चों के BMI, मोटापा, एनीमिया और डायबिटीज जैसी समस्याओं पर सरकारी योजनाओं का प्रभाव भी अधिक असरदार होगा। देश के बड़े अस्पतालों से जुटाए जा रहे डेटा की मदद से यह मानक तैयार किए जाएंगे, जिससे डॉक्टर भारतीय बच्चों की शारीरिक और पोषण संबंधी जरूरतों के अनुसार सही इलाज तय कर सकेंगे।













