क्या ईरान में खत्म होगा खामेनेई युग? इस्लामिक क्रांति से पहले कैसे थे भारत–ईरान के रिश्ते

15 January 2026 Fact Recorder 

National Desk :  ईरान इस समय गंभीर उथल-पुथल के दौर से गुजर रहा है। देशभर में हो रहे प्रदर्शनों के बीच खामेनेई युग के अंत की मांग तेज होती जा रही है। प्रदर्शनकारियों को अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का खुला समर्थन मिलने से यह संकट अब केवल आंतरिक नहीं रहा, बल्कि वाशिंगटन और तेहरान के बीच टकराव का रूप ले चुका है। मौजूदा हालात में सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई के सामने सत्ता बचाए रखना बड़ी चुनौती बन गया है। अगर यह दौर खत्म होता है, तो यह 1979 की इस्लामिक क्रांति से शुरू हुए एक लंबे अध्याय का भी अंत होगा।

ऐसे में यह जानना अहम हो जाता है कि इस्लामिक क्रांति से पहले, शाह के दौर में भारत और ईरान के संबंध कैसे थे और किन परिस्थितियों से गुजरते हुए ये रिश्ते यहां तक पहुंचे।

आजादी से पहले और बाद के शुरुआती रिश्ते
भारत की आजादी से पहले पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ईरान से रूसी सेनाओं को हटाने की मांग का समर्थन किया था, हालांकि उन्होंने सोवियत संघ की खुली आलोचना से परहेज किया। इसके बावजूद ईरान में भारत के प्रति सकारात्मक नजरिया बना रहा। मार्च 1947 में ईरान ने नई दिल्ली में आयोजित एशियाई संबंध सम्मेलन में हिस्सा लिया और भारत की आजादी का स्वागत किया।

भारत और ईरान के बीच औपचारिक राजनयिक संबंध 15 मार्च 1950 को स्थापित हुए। दोनों देशों ने मित्रता संधि पर हस्ताक्षर किए, जिसमें शांति और सहयोग बनाए रखने की प्रतिबद्धता जताई गई। हालांकि 1950 के दशक में भारत की गुटनिरपेक्ष नीति और ईरान का पश्चिमी देशों के साथ झुकाव, रिश्तों में दूरी की वजह बना।

पश्चिम बनाम गुटनिरपेक्षता की राजनीति
शीत युद्ध के दौर में भारत ने किसी भी सैन्य गुट से दूरी बनाए रखी, जबकि ईरान पश्चिमी खेमे के करीब रहा। नेहरू द्वारा मिस्र के नेता गमाल अब्देल नासिर का समर्थन ईरान के शाह को रास नहीं आया। नासिर के अरब राष्ट्रवाद और राजशाही विरोधी रुख ने शाह की असुरक्षा और बढ़ा दी। इसके जवाब में शाह ने इस्लाम को एक राजनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया और पाकिस्तान से नजदीकियां बढ़ाईं।

हालांकि, पाकिस्तान के साथ ईरान की दोस्ती भारत के खिलाफ सीधे तौर पर नहीं थी, लेकिन इससे नई दिल्ली में असहजता जरूर पैदा हुई। बावजूद इसके, भारत और ईरान के बीच व्यापारिक संबंध अपेक्षाकृत स्थिर बने रहे।

युद्धों में बदला रुख
1962 के भारत-चीन युद्ध में ईरान ने खुलकर भारत का समर्थन किया और चीन की आलोचना की। लेकिन 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में ईरान का झुकाव पाकिस्तान की ओर रहा। इसके बावजूद, ईरान ने भारत को तेल की आपूर्ति कभी बंद नहीं की, जो दोनों देशों के व्यावहारिक रिश्तों को दर्शाता है।

1970 का दशक और रिश्तों में गर्माहट
1970 के दशक में भारत और ईरान दोनों ही अपने-अपने क्षेत्रों में उभरती ताकतें बन चुके थे। ईरान को लगा कि क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने के लिए भारत, पाकिस्तान और अफगानिस्तान – तीनों से संतुलित संबंध जरूरी हैं। 1973 के अरब-इजरायल युद्ध के बाद तेल की कीमतों में उछाल से ईरान की आर्थिक ताकत बढ़ी और भारत के साथ सहयोग के नए रास्ते खुले।

इसी दौर में भारत-ईरान आर्थिक और तकनीकी सहयोग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। कुद्रेमुख लौह अयस्क परियोजना जैसे बड़े समझौते हुए, जिन्हें द्विपक्षीय रिश्तों में मील का पत्थर माना गया।

नेतृत्व स्तर पर करीबी
प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी, विदेश मंत्री सरदार स्वर्ण सिंह और बाद में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई के ईरान दौरों ने रिश्तों को नई मजबूती दी। 1978 में शाह और शाहबानो का भारत दौरा भी इसी बढ़ती नजदीकी का संकेत था।

1979 की इस्लामिक क्रांति के साथ ही यह दौर अचानक समाप्त हो गया। अब, जब ईरान एक बार फिर ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, तो शाह के दौर की भारत-ईरान दोस्ती को समझना मौजूदा हालात को देखने की एक अहम कड़ी बन जाता है।