बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी पर दोहरे तुष्टीकरण के आरोप, क्या वाकई हिंदुओं को साधने की कोशिश कर रहीं CM?

बंगाल की राजनीति में ममता बनर्जी पर दोहरे तुष्टीकरण के आरोप, क्या वाकई हिंदुओं को साधने की कोशिश कर रहीं CM?

30 दिसंबर, 2025 फैक्ट रिकॉर्डर

National Desk:  पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी माहौल गरमाता जा रहा है और इसके केंद्र में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी हैं। एक तरफ बीजेपी उन पर मुसलमानों को खुश करने की राजनीति का आरोप लगाती रही है, वहीं दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस (TMC) से निकाले गए नेता हुमायूं कबीर ने ममता पर हिंदुओं को साधने का आरोप लगाकर नया सियासी विवाद खड़ा कर दिया है।

इन आरोपों पर ममता बनर्जी ने साफ कहा है कि वह धर्मनिरपेक्ष हैं और सभी धर्मों के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व में विश्वास करती हैं। उनका कहना है कि उन पर तुष्टीकरण की राजनीति करने के आरोप बेबुनियाद हैं।

बीजेपी लंबे समय से ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाती रही है, लेकिन हुमायूं कबीर के बयान के बाद बंगाल की राजनीति में नया मोड़ आ गया है। कबीर ने दावा किया कि 2026 का विधानसभा चुनाव हिंदू बनाम मुस्लिम होगा। उन्होंने आरोप लगाया कि बीजेपी जहां खुलकर हिंदू राजनीति कर रही है, वहीं ममता बनर्जी भी जगन्नाथ मंदिर निर्माण, दुर्गा पूजा कार्निवल और पूजा समितियों को फंड देकर हिंदू तुष्टीकरण में लगी हैं।

हुमायूं कबीर ने खुद को मुसलमानों का नेता बताते हुए कहा कि 2026 में मुस्लिम वोट ममता बनर्जी के साथ नहीं जाएगा। उन्होंने यहां तक दावा किया कि जरूरत पड़ी तो वह 200 उम्मीदवार मैदान में उतारेंगे, जिनमें 90 मुस्लिम होंगे। उनका कहना है कि मुसलमानों को अब अपनी आवाज उठाने वाला अलग नेतृत्व चाहिए।

ममता बनर्जी इस विवाद के केंद्र में इसलिए भी हैं क्योंकि अब तक उन्हें बंगाल में हिंदू और मुस्लिम—दोनों वर्गों का समर्थन मिलता रहा है। हुमायूं कबीर अब अपनी अलग राजनीतिक पहचान और नया वोटबैंक बनाने की कोशिश में जुटे हैं, जिसके चलते वे ममता से दूरी बना रहे हैं।

जहां तक हिंदू तुष्टीकरण के आरोपों की बात है, आलोचकों का कहना है कि ममता ने भगवान राम पर विवादित टिप्पणी करने वाले विधायक मदन मित्रा के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। बीजेपी ने इसे मुद्दा बनाते हुए आरोप लगाया कि ऐसे बयान ममता की सहमति से दिए जाते हैं। पार्टी प्रवक्ता गौरव भाटिया ने दावा किया कि इससे करोड़ों हिंदुओं की भावनाएं आहत हुईं और यह ममता की कथित सांप्रदायिक राजनीति को दिखाता है।

बीजेपी नेता 2019 की एक घटना का भी जिक्र करते हैं, जब ‘जय श्री राम’ कहे जाने पर ममता की प्रतिक्रिया को लेकर विवाद हुआ था। इसके अलावा ‘महाकुंभ’ को लेकर उनके बयान और कुछ हिंदू संतों व धार्मिक संगठनों पर की गई टिप्पणियों को भी बीजेपी उनके खिलाफ इस्तेमाल करती रही है। इनमें रामकृष्ण मिशन, भारत सेवाश्रम संघ और इस्कॉन जैसे प्रतिष्ठित संगठन शामिल हैं।

CAA के विरोध को लेकर भी बीजेपी ममता को घेरती रही है। पार्टी का आरोप है कि नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर ममता बनर्जी बंगाली हिंदुओं के हितों के खिलाफ काम कर रही हैं, खासकर उन परिवारों के खिलाफ जिन्होंने विभाजन और उत्पीड़न का दर्द झेला है।

दूसरी ओर, ममता बनर्जी खुद को हिंदू विरोधी बताने के आरोपों को खारिज करती रही हैं। उन्होंने कहा है कि वह एक ब्राह्मण परिवार से आती हैं और उन्हें अपने हिंदू होने पर गर्व है। हाल के महीनों में उन्होंने कई धार्मिक और सांस्कृतिक परियोजनाओं की घोषणा भी की है। सिलीगुड़ी में महाकाल मंदिर की आधारशिला रखने से लेकर कोलकाता में ‘दुर्गा आंगन’ सांस्कृतिक परिसर की शुरुआत तक, ममता अपनी सरकार के काम गिनाती रही हैं। साथ ही गंगासागर मेला, कालीघाट और दक्षिणेश्वर जैसे धार्मिक स्थलों के विकास का भी जिक्र करती हैं।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ममता बनर्जी की यह रणनीति बीजेपी के हिंदू राष्ट्रवादी नैरेटिव का मुकाबला करने और राज्य के बड़े मुस्लिम वोटबैंक को अपने पाले में बनाए रखने की कोशिश का हिस्सा है। पश्चिम बंगाल में करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम आबादी है, जो हर चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाती है। ऐसे में आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि ममता बनर्जी इन आरोपों के बीच अपने राजनीतिक संतुलन को कैसे साधती हैं।