“बच्चे चीखते रहे ‘छत गिर रही है’, लेकिन मैडम ने दरवाज़ा बंद कर दिया” – झालावाड़ हादसे में चौंकाने वाला खुलासा

26 जुलाई 2025 फैक्टर रिकॉर्डर

National Desk: झालावाड़ स्कूल हादसा: बच्चों की चेतावनी को नजरअंदाज किया गया, छत गिरने से सात मासूमों की मौ*त                                                                                                                          झालावाड़, राजस्थान:
राजस्थान के झालावाड़ जिले के पिपलोदी गांव में शुक्रवार को हुए दिल दहला देने वाले हादसे में सरकारी स्कूल की जर्जर छत गिर गई, जिसमें सात मासूम बच्चों की मौत हो गई। यह हादसा केवल एक निर्माण की चूक नहीं, बल्कि लापरवाही, अनदेखी और अमानवीयता की श्रृंखला का नतीजा है।

इस दर्दनाक घटना ने न केवल स्कूल प्रशासन बल्कि पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। गांव के लोग पहले ही स्कूल भवन की जर्जर स्थिति को लेकर शिकायत कर चुके थे, लेकिन किसी ने समय रहते कोई कदम नहीं उठाया।

पहली गवाही: “बच्चों ने चेताया, पर मैडम ने बंद कर दी कुंडी”
हादसे के बाद पीड़ित परिवार की एक महिला ने बताया,

“स्कूल की हालत खराब थी, हमने प्रशासन को बता दिया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। एक छोटा बच्चा बोला कि छत गिरने वाली है, कंकड़ गिर रहे हैं। मीना मैडम ने कमरा अंदर से बंद कर लिया, कुंडी लगा दी। बाद में गांव वालों ने दरवाजा खोला, मैडम ने नहीं। वह बाहर ही खड़ी रही। अगर वो बच्चे की बात सुन लेती, तो शायद जानें बच जातीं।”

दूसरी गवाही: “शिक्षक ने बच्चों को अंदर बैठा दिया, और छत गिर गई”
गांव के निवासी बनवारी, जो बच्चों को मलबे से निकालकर अस्पताल तक ले गए, ने कहा:

“बच्चे-बच्चियां बाहर भाग रहे थे, तो शिक्षक ने डांटकर उन्हें फिर अंदर बैठा दिया। थोड़ी देर में छत गिर गई और सब मलबे के नीचे दब गए। स्कूल की छत से पहले ही पानी टपक रहा था, हमने पांच-छह दिन पहले शिकायत की थी, पर शिक्षकों ने कोई कदम नहीं उठाया। बोले गांव वाले करवाएंगे काम।”

यह बयान शिक्षकों की सीधी जिम्मेदारी की ओर इशारा करता है — बच्चों को खतरनाक स्थिति से बाहर निकालने की बजाय जानलेवा इमारत के नीचे बैठा दिया गया।

तीसरी प्रतिक्रिया: जिला प्रशासन की चूक
झालावाड़ के जिला कलेक्टर अजय सिंह राठौर ने हादसे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा:

“शिक्षा विभाग को पहले ही निर्देश दिए गए थे कि जर्जर भवन वाले स्कूलों की छुट्टियां कर दी जाएं। लेकिन इस स्कूल का नाम हमें सूची में नहीं मिला। अब जांच करवाई जा रही है कि गलती कहां हुई।”

यह बयान प्रशासनिक तंत्र की लापरवाही और सूचनाओं के अभाव को उजागर करता है। शिकायतों की जानकारी नीचे से ऊपर तक नहीं पहुंची — और जब तक प्रशासन जागता, तब तक सात मासूमों की जिंदगी जा चुकी थी।

अब उठ रहे हैं कड़े सवाल
हादसे के बाद शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने बयान दिया कि 2,000 स्कूलों की मरम्मत का काम चल रहा है और इस हादसे की जिम्मेदारी वह खुद लेते हैं। लेकिन सवाल यह है कि हादसे से पहले क्यों नहीं जागा सिस्टम? क्यों बच्चों की चेतावनी, गांव वालों की शिकायतें और छत से गिरते कंकड़ किसी के लिए चेतावनी नहीं बने?