वक्फ संशोधन विधेयक इस हफ्ते संसद से पारित हो गया। इस दौरान लोकसभा और राज्यसभा में 25 घंटे से ज्यादा की चर्चा हुई। इस चर्चा में पक्ष और विपक्ष की तरफ से दिए गए तर्कों में कितना दम था? विधेयक के कानून बनने के बाद वक्फ बोर्ड के कामकाज में कितना बदलाव होगा? इस तरह के सवालों पर इस हफ्ते ‘खबरों के खिलाड़ी’ में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह, राकेश शुक्ल, पूर्णिमा त्रिपाठी, अवधेश कुमार और कुर्बान अली मौजूद रहे।
रामकृपाल सिंह: विपक्ष के लिए यह संसद में एक अच्छा मौका था, लेकिन नेता प्रतिपक्ष बोले ही नहीं। अखिलेश यादव ने जो बोला, उसे सुनकर मैं अवाक् था। उस समय आप जिस बिल का विरोध कर रहे हैं, उस पर बोलना चाहिए था। मुझे लगता है कि जिन दलों के पास संख्या नहीं है, वो छोटी-छोटी पार्टियां ज्यादा अच्छा बोलीं। जो यह मानते थे कि यह कमजोर सरकार है, इस बिल ने उन आशंकाओं को दूर कर दिया, जिसे लेकर कहा जाता था कि सत्ता पक्ष कमजोर है।
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पूर्णिमा त्रिपाठी: इस पूरी बहस की जड़ ही सियासत है। अगर सियासत का मसला नहीं होता तो इस पर इतनी चर्चा नहीं होती। मुझे लगता है कि विपक्ष की जो धार होनी चाहिए थी वो इस बिल के दौरान दिखाई नहीं दी। वक्फ बोर्ड में सब कुछ सही नहीं है, वो सबको पता है। उसे सही करने की जरूरत है, यह भी सभी को पता है। लालू यादव का 2013 का भाषण सरकार के लिए सबसे बड़ा हथियार बन गया। अंदर खाने सबको पता है कि वक्फ बोर्ड में सुधार की जरूरत है।
राकेश शुक्ल: पुराने वक्फ की कई धाराएं ऐसी थीं, जो मुस्लिम समाज के गरीब के लिए हानिकारक थीं। नए बिल से न्याय का एक नया रास्ता तैयार होगा। इससे पारदर्शिता भी आएगी। अगर आपके पास कागज नहीं है तो वो दान की भूमि कैसे हो सकती है। वक्फ बोर्ड को एक आंकड़ा यह भी रखना चाहिए कि आपने गरीब कल्याण के कितने काम किए।
कुर्बान अली: इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश के तमाम कानूनों की तरह वक्फ कानून में भी संशोधन की जरूरत है, लेकिन आप दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करते हैं, उसमें किस तरह से कानून बनते हैं, उसका एक तरीका होता है। किसानों के लिए जो कानून बनाए गए थे, उन्हें आपने कैसे वापस लिया? आप जो वक्फ कानून लाए हैं, उसके पीछे आपकी मंशा क्या है, यह भी देखना होगा।
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अवधेश कुमार: 2013 में जो विधेयक पारित हुआ था वो चार घंटे की बहस के बाद पारित हुआ था। इस बार का विधेयक 27 घंटे से ज्यादा की चर्चा के बाद पारित हुआ। क्या चार घंटे में पारित होना लोकतांत्रिक प्रक्रिया है या अभी जो हुआ वो लोकतांत्रिक प्रक्रिया है? वक्फ एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ दान देने से है, लेकिन वक्फ बोर्ड कैसे धार्मिक शब्द हो गया? सरकार के इरादे को छोड़ दीजिए, लेकिन जो रिफॉर्म किए गए हैं, उसमें क्या गलत है, विपक्ष को यह बताना चाहिए?