10 मिनट डिलीवरी पर ब्रेक! ब्लिंकिट–जेप्टो के क्विक-कॉमर्स मॉडल पर संकट, क्या खत्म होगी सुपरफास्ट सर्विस?

08 January 2026 Fact Recorder

Business Desk:  भारत में तेजी से बढ़ रही क्विक-कॉमर्स इंडस्ट्री पर दबाव बढ़ता नजर आ रहा है। नए साल की पूर्व संध्या पर देशभर में 2 लाख से ज्यादा डिलीवरी राइडर्स की हड़ताल ने 10 मिनट डिलीवरी मॉडल को कटघरे में खड़ा कर दिया है। राइडर्स की मांग सिर्फ बेहतर वेतन और सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि वे सुपरफास्ट डिलीवरी सिस्टम को पूरी तरह खत्म करने की बात कर रहे हैं।

ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 30 मिनट से कम समय में डिलीवरी की आदत कोविड लॉकडाउन के दौरान पनपी। अमेरिका और यूरोप में जहां क्विक-कॉमर्स कंपनियां जैसे गोपफ, गोरिल्लाज और गेटिर समय के साथ बंद हो गईं, वहीं भारत में ब्लिंकिट, जेप्टो, स्विगी इंस्टामार्ट जैसे प्लेटफॉर्म डिलीवरी समय और घटाकर 10 मिनट तक ले आए और प्रोडक्ट्स की रेंज भी लगातार बढ़ाते रहे।

इस मॉडल को सपोर्ट करने के लिए कंपनियों ने ‘डार्क स्टोर्स’ पर भारी निवेश किया है। ये छोटे गोदाम शहरों के भीतर रणनीतिक जगहों पर बनाए जाते हैं ताकि ऑर्डर जल्दी पूरे हो सकें। रियल एस्टेट फर्म सैविल्स के अनुमान के अनुसार, 2030 तक भारत में डार्क स्टोर्स की संख्या 2,500 से बढ़कर 7,500 तक पहुंच सकती है, क्योंकि छोटे शहरों में भी फास्ट डिलीवरी की मांग बढ़ रही है।

हालांकि, गिग वर्कर्स की हालिया हड़ताल ने इस रफ्तार की कीमत पर बहस छेड़ दी है। राइडर्स का कहना है कि समय पर डिलीवरी का दबाव उन्हें जोखिम भरी ड्राइविंग के लिए मजबूर करता है। देरी की स्थिति में खराब रेटिंग, जुर्माना और सुपरवाइजर की फटकार झेलनी पड़ती है। भीड़भाड़ और खराब सड़कों वाले शहरों में यह मॉडल उनकी सुरक्षा के लिए खतरा बन रहा है।

इस अनिश्चितता का असर निवेशकों पर भी पड़ा है। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, अक्टूबर के मध्य से स्विगी और इटरनल लिमिटेड (जोमैटो और ब्लिंकिट की पैरेंट कंपनी) के शेयर करीब 20 फीसदी गिर चुके हैं, जबकि निफ्टी 50 लगभग स्थिर रहा है। गिग वर्कर्स के लिए नए लेबर कोड्स और सामाजिक सुरक्षा की मांगों ने भी कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है।

इटरनल के सीईओ दीपेंद्र गोयल ने हड़ताल के असर को कमतर बताते हुए कहा कि 31 दिसंबर को ऑर्डर 75 लाख के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचे और ऑपरेशंस प्रभावित नहीं हुए। उन्होंने यह भी दावा किया कि 10 मिनट डिलीवरी से असुरक्षित ड्राइविंग को बढ़ावा नहीं मिलता और औसतन राइडर्स 2 किलोमीटर की दूरी 16 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से तय करते हैं। कंपनी इंश्योरेंस देती है और एक राइडर औसतन 102 रुपये प्रति घंटे कमाता है।

हालांकि, इन्हीं आंकड़ों से मॉडल की कमजोरियां भी सामने आती हैं। ज़ोमैटो के आंकड़ों के अनुसार, एक साल में औसतन राइडर्स सिर्फ 38 दिन ही काम करते हैं और केवल 2.3 फीसदी लोग 250 दिनों से ज्यादा सक्रिय रहते हैं। इससे सवाल उठता है कि क्या यह मॉडल लंबे समय तक टिकाऊ रोजगार दे सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में श्रम की भरपूर उपलब्धता के कारण कंपनियां फिलहाल सिस्टम को चला पा रही हैं, लेकिन अगर रेगुलेटर्स ने डिलीवरी समय बढ़ाने या श्रमिक सुरक्षा को सख्ती से लागू किया, तो 10 मिनट डिलीवरी का पूरा बिजनेस मॉडल ही खतरे में पड़ सकता है। ऐसे में आने वाले समय में क्विक-कॉमर्स को रफ्तार और जिम्मेदारी के बीच संतुलन बनाना होगा।